राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026: भारत में मानव अधिकार चुनौतियाँ

चित्र
  Cradit:Advt. of U P Govt भूमिका  भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु दर बहुत अधिक है | हर दिन सैकड़ों परिवार अपने लोगों को खो देते हैं |  यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चिंता है | इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026 की शुरूआत की, ताकि सड़क दुर्घटनाओं को रोका जा सके |  इसके अलावा इसका उद्देश्य आम नागरिकों में जिम्मेदार यातायात व्यवहार को विकसित करना है, यह व्यवहार ही सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का सर्वश्रेष्ट्र उपाय है |  सरकार द्वारा चलाया जाने वाला यह अभियान आम जनता तक सिर्फ यातायात नियमों की जानकारी प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुरक्षित सड़को और सुरक्षित यात्रा से जुड़ा मानव अधिकार है, जो प्रत्यक्ष रूप संविधान प्रद्दत जीवन के अधिकार के अधीन आता है | यह राज्य की जिम्मेदारी है। यह भी पढ़ें  : प्रेम के नाम पर पॉक्सो से मुक्ति: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सड़क दुर्घटनाओं का वैश्विक भार  विश्व भर में हर साल रोड ट्रैफिक दुर्घटनाओं की वजह से लगभग 11.9 ल...

POCSO कानून का दुरुपयोग: ‘Romeo–Juliet’ Clause क्यों बनी मानवाधिकार आवश्यकता ?

भारत में POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बना, लेकिन हालिया न्यायिक टिप्पणियों और शोधों ने इसके दुरुपयोग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं…

POCSO कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा और Romeo-Juliet Clause की मानवाधिकार आवश्यकता
Cradit : Chat GPT

प्रस्तावना 

भारत में बच्चों के संरक्षण के लिए बनाया गया POCSO Act, 2012 एक महत्वपूर्ण और कठोर कानून के रूप में जाना जाता है | इस कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों को शोषण, हिंसा और उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान करना है | 

किन्तु हालिया वर्षों में इस क़ानून के दुरूपयोग के अनेक मामले भारतीय उच्च न्यायालयों में पहुंचे हैं |जिनमें सहमति से रिश्ता बनाने वाले किशोरों को अपराधी बनाया गया है | 

इन मामलों में हाई कोर्ट्स ने भी समय - समय पर इस सम्बन्ध में चिंता जाहिर की हैं | 

लेकिन भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार POCSO के दुरूपयोग के सम्बन्ध एक हालिया निर्णय उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध और अन्य, Criminal Appeal @SLP (Crl)10656 of 2025 में स्पष्ट किया है कि उन व्यक्तियों पर मुकदद्मा चलाने के लिए एक तंत्र बनाया जाना चाहिए, जो इन कानूनों का उपयोग करके हिसाब बराबर करते हैं | 

इसके अलावा अदालत ने कानून में सुधार के मकसद से Romeo -Juliet Clause शामिल किये जाने हेतु सरकार को दिशानिर्देशों की सिफारिश की है | प्रश्न उठता है कि क्या यह आज एक मानव अधिकार आवश्य्कता है | 

यह भी पढ़ें :मानव अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026: भारत की चुनौतियाँ 

POCSO कानून का उद्देश्य क्या है ?

POCSO कानून का उद्देश्य स्पष्ट है: बच्चों का लैंगिक हमले, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य से संरक्षण करने तथा ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना | 

इस कानून के तहत अपराधों को रोकने के लिए कठोर दंड की भी व्यवस्था की गयी है | इसके अतिरिक्त इस कानून का उदेश्य पीड़ित केंद्रित न्याय प्रणाली स्थापित करना भी रहा है | जिसमे तत्काल चिकित्सा व्यवस्था से लेकर गोपनीयता का संरक्षण, पुनर्वास तथा आर्थिक सहायता भी शामिल है | 

मद्रास हाई कोर्ट ने विजयलक्ष्मी बनाम राज्य, 2021 SCC OnLine Mad 317 में POCSO एक्ट के उद्देश्यों और कारणों के कथन की व्याख्या करते हुए कहा है कि, "इसका उद्देश्य किशोरों के बीच सहमति से बने प्रेम संबंधों को अपराध घोषित करना नहीं है |"  

यह भी पढ़ें : मानवाधिकार शिक्षा का नया अध्याय: बच्चों को सिखाई जाएगी लैंगिक सुरक्षा की समझ

“Romeo–Juliet" Clause की अवधारणा पर न्यायिक पहल  की शुरुआत 

POCSO के तहत रोमांटिक मामले पर एक संक्षिप्त  शोध विश्लेषण   

एनफोल्ड इंडिया ने POCSO अधिनियम के तहत जून 2022 में एक अध्य्यन किया जिमे 1,715  मामलों का विश्लेषण किया गया | जिसमे पाया गया कि लगभग 88 प्रतिशत मामलो में लड़की ने आरोपी के साथ आपसी सहमति से बने रोमांटिक रिश्ते को स्वीकार किया | 

80 प्रतिशत से अधिक मामलों में शिकायत माता-पिता या रिस्तेदार द्वारा दर्ज कराई गई थी | सबसे महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में 81.5 प्रतिशत मामलों में आरोपी के विरुद्ध कोई दोषपूर्ण ब्यान नहीं दिया |

यह अध्ययन दिखाता है कि POCSO कानून का उपयोग बड़ी संख्या में सहमति से बने किशोर सम्बन्धो को अपराध का रूप देने में हो रहा है | यही कारण है कि कानून में सहमति और शोषण आधारित संबंधों के बीच स्पष्ट अन्तर की समीक्षा की बात उठती रही है |

किशोरों के सहमति आधारित संबंधों पर मद्रास हाई कोर्ट की न्यायिक पहल 

मद्रास हाई कोर्ट ने विधिव्यवस्था A और B (वास्तविक नामो के स्थान पर A और B लिखा गया है )  बनाम राज्य प्रतिनिधि द्वारा पुलिस निरीक्षक, महिला पुलिस स्टेशन ईरोड तथा इंद्रन @ शिव,  सीआरएल.ओपी संख्या 232 वर्ष 2021 और क्रिमिनल एमपी नंबर 109 ऑफ 2021 में कहा है कि, "किसी नाबालिग लड़की के साथ संबंध बनाने वाले किशोर लड़के को अपराधी मानकर दंडित करना POCSO अधिनियम का उद्देश्य कभी नहीं था।"

"किशोरावस्था के वे लड़के और लड़कियाँ जो हार्मोनल और शारीरिक परिवर्तनों से जूझ रहे हैं और जिनकी निर्णय लेने की क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है, उन्हें अनिवार्य रूप से अपने माता-पिता और समाज का समर्थन और मार्गदर्शन मिलना चाहिए। 

इन घटनाओं को कभी भी वयस्क के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा दृष्टिकोण वास्तव में सहानुभूति की कमी को जन्म देगा। इस तरह के मामले में जेल भेजे गए किशोर लड़के को जीवन भर पीड़ा झेलनी पड़ेगी। 

अब समय आ गया है कि विधायिका ऐसे मामलों पर विचार करे जिनमें किशोर यौन संबंधों में शामिल हों और अधिनियम में आवश्यक संशोधन शीघ्रता से लाए। 

विधायिका को बदलते सामाजिक जरूरतों के साथ तालमेल बिठाना होगा और कानून में, विशेष रूप से POCSO अधिनियम जैसे कठोर कानून में, आवश्यक बदलाव लाने होंगे।"

यह भी पढ़ें :प्रेम के नाम पर पॉक्सो से मुक्ति: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्याय मित्र इंदिरा जयसिंग की निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें 

इंदिरा जय सिंह  द्वारा किशोरों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों के सम्बन्ध में दी गई महत्वपूर्ण दलीलें निम्नवत हैं :

1 . यह कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को स्वतः अपराध मानना  न सिर्फ अवैज्ञानिक है, बल्कि यह किशोरों की स्वायत्तता ,गरिमा और निजता के अधिकारों का उल्लंघन है| उन्होंने यौन स्वायत्तता को मानवीय गरिमा का अभिन्न अंग बताया और कहा कि किशोरों को इससे वंचित करना संविधान के अनुछेद 14 ,15 ,19 और 21 के विरुद्ध है | 

2. न्याय मित्र ने आकड़ों के आधार पर यह भी बताया कि POCSO के तहत दर्ज अधिकांश मामले सहमति आधारित किशोर सम्बन्धो से जुड़े होते हैं जिनमे अक्सर शिकायतें पीड़ित के माँ-बाप द्वारा कराई जाती हैं और उनके पीछे अन्तर्जातीय या अंतर्धार्मिक  या असहमति मुख्य कारक होते हैं | 

3. उन्होंने अदालत से कहा कि वर्तमान क़ानून में Clause -in -Age -Exception जोड़ने तथा सहमति तथा शोषण में स्पष्ट अंतर करने तथा अनिवार्य रिपोर्टिंग जैसे प्रावधानों की समीक्षा की भी सिफारिश की है |   

POCSO के अधीन अनिवार्य रिपोर्टिंग 

भारत में POCSO के तहत किसी भी नाबालिग के साथ यौन गतिविधि की जानकारी होने पर पुलिस को सूचित करना कानूनी बाध्यता है | 

इंग्लैंड में Romio -Juliet Clause आपसी सहमति से बने किशोर संबंधों को बाल शोषण रिपोर्टिंग से छूट देता है | इस छूट का मतलब है कि शिक्षकों को सभी मामलों में किशोरों की यौन गतिविधयों के बारे में अधिकारियों को सूचित करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा | 

भारत में इस तरह की छूट का प्रावधान किसी के लिए उपलब्ध नहीं है | 

POCSO के अधीन उम्र निर्धारण: दुरुपयोग का सबसे संवेदनशील बिंदु

POCSO कानून के अधीन दिए गए अपराधों के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति को आरोपी बनाये जाने के लिए पीड़ित का नाबालिग होना प्रथम और आवश्यक शर्त है | यह कानून लिंग -तटस्त (Gendral-Neutral) है अर्थात पीड़ित के रूप में  यह लड़के या लड़की में कोई विवेध नहीं करता है | 

न्यायालय ने पाया है कि POCSO के निर्धारण में पीड़ित की उम्र निर्धारण की महत्वपूर्ण और केंद्रीय भूमिका होती है| 

अदालत के अनुसार किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015  (JJ Act, 2015 ) की धारा 94 के अनुसार पीड़ित की आयु निर्धारण के लिए दस्तावेज आवश्यक हैं, लेकिन अंतिम सत्य नहीं है | 

जब पीड़ित के आयु सम्बंधित दस्तावेज उपलब्ध है, लेकिन गवाह के कथनो में विरोधाभास है | ऐसी स्थति में पीड़ित की आयु निर्धारण हेतु चिकित्सकीय परीक्षण से इंकार नहीं किया जा सकता है | 

बस यही केंद्रीय बिंदु है, जिसका सर्वाधिक उपयोग  POCSO जैसे कठोर क़ानून के दुरूपयोग के लिए होता है | यह जानबूज कर भी हो सकता है और विचारण न्यायालयों के उचित प्रशिक्षण के अभाव में भी हो सकता है | 

संदिग्ध उम्र के आधार पर सहमति आधारित संबंधों में लिप्त किशोरों को अपराधी ठहरा दिया जाता है | पीड़ित की सही -सही उम्र निर्धारण के बिना सिर्फ संदिग्ध उम्र के आधार पर सहमति आधारित संबंधों में आरोपियों को अपराधी ठहरा देना न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है | 

POCSO कानून के दुरूपयोग की यह पराकाष्ठा सीधे तौर पर किशोरों के मानव अधिकार उलंघन से जुड़ती है | 

संदिग्ध उम्र के आधार पर सहमति आधारित संबंधों के दायरे में आने वाले किशोरों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखे जाने के उद्देश्य से ही भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हालिया आदेश में सरकार को Romeo -Juliet Clause पर विचार करने के किये दिशानिर्देश दिए गए हैं | 

अदालत का यह कदम POCSO कानून के दुरूपयोग पर अदालत के गंभीर रूख को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है|  

यह भी पढ़ें : पॉक्सो पीड़ितों की सुरक्षा और पुनर्वास: भारत में डिजिटल मानव अधिकार मॉडल की ज़रूरत

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: दुरुपयोग पर न्यायिक समीक्षा 

POCSO के सैद्धांतिक पहलुओं के परे व्यवहार में अनेक मामलों में यह सामने आया है कि क़ानून का दुरूपयोग करके सामान आयु के किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों को भी पोक्सो के तहत गंभीर अपराधों में बदल दिया गया | इन मामलों में पारिवारिक असहमति या सामाजिक दबाब आदि के चलते ऐसा हुआ | 

परिणाम स्वरुप किशोरों को अनावश्यक रूप से आपराधिक प्रक्रिया, हिरासत और मुकदद्मे का सामना करना पड़ा | यह स्तिथि क़ानून के संरक्षणात्मक स्वरुप से परे जाकर बदला लेने के हतियार के रूप में दृष्टिगोचर होती है | 

वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी 

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है कि वकीलों का कर्तव्य सिर्फ आक्रामक पैरवी करना नहीं है बल्कि विवेक ,तर्क और शांति से संतुलन निर्मित करना भी है | 

दुर्भावना पूर्ण और तुच्छ मुकदद्मों को आगे बढ़ाना न्याय के उद्देश्य के विरुद्ध है | ऐसी मुकदद्मेबाजी से मुवक्किल को भी दीर्घकालीन नुक्सान हो सकता है | जिसमे प्रतिकूल आदेश या न्यायिक निंदा शामिल है | 

बार एसोसिएशन एक “संवैधानिक फ़िल्टर” 

अदालत ने कहा कि बार को कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए फ़िल्टर (छलनी) का काम करना चाहिए | जब अधिवक्ता नैतिक आत्म -नियमन करता है, तो जनता का भी न्याय प्रणाली पर आत्मविश्वास बढ़ता है | इससे न्यायालयों का समय वास्तविक विवादों के लिए सुरक्षित रहता है |  

 कानून न्याय का साधन है, हथियार नहीं

हालिया आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य न्याय है, न कि उसे सुविधा या बदले का हथियार बनाना है | क़ानून का स्वार्थी और अवसरवादी उपयोग न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है| 

 केवल कानून बदलना पर्याप्त नहीं

अदालत ने विधायी संशोधन या न्यायिक निर्देश को भी बिना नैतिक साहस, अनुशासन और साहस के बिना अप्रभावी बताया है | 

 समाज की भी जिम्मेदारी

शिकायत दर्ज करते समय निजी हितों की बजाय कानून का आशय और उद्देश्य सर्वोपरि रखे जाने चाहिए | दुर्भावना पूर्ण शिकायतें या क़ानून का दुरूपयोग न्यायिक संसाधनों का भी दुरूपयोग है | 

 POCSO के दुरुपयोग पर बार-बार न्यायिक संज्ञान

कई हाई कोर्ट्स ने अपने निर्णयों  में POCSO के दुरुपयोग का न्यायिक संज्ञान लिया है | यह प्रवृति हालिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मेल खाती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है | 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि सहमति से बने रिश्तों में किशोरों के खिलाफ POCSO का गलत इस्तेमाल हो रहा है। 

भारत सरकार के विधि सचिव को हस्तक्षेप का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेशित किया है कि इस निर्णय की प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए | जिसका उद्देश्य  सरकार की ओर से निम्नलिखित बिंदुओं पर कदम उठाया जाना है : 

सहमति पर आधारित वास्तविक किशोर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने के लिए 

👉Romeo-Juliet Clause पर विचार करना |   

POCSO क़ानून का दुरूपयोग कर हिसाब बराबर करने वालों के विरुद्ध 

👉अभियोजन का तंत्र विकसित करना | 

संक्षेप मे कहा जाये तो सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि क़ानून की रक्षा केवल अदालतों से संभव नहीं हो सकती है, बल्कि इसके लिए वकीलों की नैतिकता, अभियोजन की विवेकशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी आवश्यक है ;अन्यथा की स्तिथि में संरक्षण कानून भी दमन का औजार बन जाते हैं | 

यह भी पढ़ें : Epstein Files के बाद सवाल: क्या भारत मे POCSO पीड़ितों के लिए सिर्फ कानून काफी है?

मानवाधिकार दृष्टिकोण: गरिमा, स्वतंत्रता और भविष्य का अधिकार  

सहमति आधारित किशोर संबंधों में POCSO कानून के तहत किशोरों की गिरफ्तारी, हिरासत और आपराधिक मुकदद्मों को मानव अधिकार दृश्टिकोण से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है | 

क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सिर्फ जीवन का अधिकार ही शामिल नहीं है, बल्कि गरिमामई जीवन, मानसिक स्वास्थ्य और विकास का अधिकार भी शामिल है | 

पारस्परिक सहमति आधारित संबंधों में लिप्त किसी किशोर को अपराधी के रूप में चिन्हित करना उसके चहुमुखी विकास और सामाजिक पहचान पर स्थाई रूप से आघात डालता है | यह मानव अधिकार मानकों के अनुरूप नहीं है तथा कई न्यायालयों ने इस  विचार पर अपनी मुहर लगाईं है | 

अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्व और POCSO कानून का प्रयोग 

भारत सयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (UNCRC )का हस्ताक्षर करता है | इस नाते बच्चों और किशोरों से जुड़े हुए कानूनों को मानव अधिकार संगत तरीकों के लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है | 

UNCRC के प्रावधानों से स्पष्ट होता है कि बाल संरक्षण का अर्थ केवल दंडात्मक कार्यवाही नहीं है बल्कि  बालक की मानवीय गरिमा , स्वायत्तता और सर्वोत्तम हितों की रक्षा करना भी है | 

UNCRC के अधीन किशोरों की विकसित होती निर्णय -क्षमता 

UNCRC के अनुछेद 3 में "बालक के सर्वोत्तम हित" के सिद्धांत को सबसे ऊपर माना है | इसी संधि के अनुच्छेद 5  और 12 में कहा गया है कि किशोरों में उम्र के साथ साथ निर्णय लेने की समझ विकसित  होती है | 

अनुछेद 16 में बच्चों के लिए निजता का अधिकार दिया गया है | ऐसी स्थति में 16 -18 के बीच की उम्र के किशोरों के बीच सहमति से बने सम्बन्धो को बिना किसी तर्क और विभेद के अपराधी ठहराना UNCRC की भावना और सिद्धांतों के पूर्ण रूप से विरुद्ध है | 

सुप्रीम कोर्ट का मानव अधिकार दृष्टिकोण 

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने समय -समय पर स्पष्ट किया है कि क़ानून का उद्देश्य सिर्फ दण्ड देना नहीं है, बल्कि मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी है |  

पुट्टास्वामी निर्णय :बाल मानव अधिकारों के सुसंगत  

जस्टिस के0 एस0 पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ 2017 में स्थापित किया गया है कि गोपनीयता में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों बाते होती हैं | 

नकारात्मक बाते राज्य को किसी नागरिक की जिंदगी और व्यक्तिगत में दखल देने से रोकती है | इसकी सकारात्मक बातें राज्य पर यह जिम्मेदारी डालती है कि  वह किसी व्यक्ति की गोपनीयता की रक्षा करने के लिए सभी कदम उठाए | 

इसके अतिरिक्त यह भी स्थापित किया कि गोपनीयता एक संवैधानिक रूप से सुरक्षित अधिकार है  और मुख्य रूप से संवैधान के अनुच्छेद 21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी से मिलता है | 

यह सिद्धांत बालको पर भी सामान रूप से लागू होता है क्योंकि बालको की उम्र के कारण उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है | 

POCSO का कठोर उपयोग और मानव अधिकार टकराव 

POCSO एक्ट, 2012 की धाराओं 3 -10 में दिए गए अपराधों में 16  से 18 वर्ष की आयु के किशोरों की सहमति को कोई महत्व नहीं दिया गया है | 

परिणामस्वरूप 16  से 18 वर्ष की आयु के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्ध भी प्रवेशन लैंगिक हमले या शोषण की श्रेणी में अपराध मान लिए जाते हैं | 

यही स्तिथि सम्पूर्ण समस्या का केंद्र बिंदु है | जिसके कारण किशोरों के मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है | 

सहमति के बाबजूद किशोरों को अपराधी मानने से संविधान के अनुच्छेद 14 ,19 और 21 पर प्रभाव 

POCSO कानून का इस प्रकार से यांत्रिक प्रयोग बच्चों के भारतीय संविधान (The Constitution of  India) के अनुच्छेद 14 ,19  और 21 में क्रमशः दिए गए समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता से टकराता है | 

बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कमेटी का जनरल कमेंट संख्या -20 (2016)  में भी चेताया गया है कि  किशोरों की यौन स्वायत्तता को नकारना उनके मानव अधिकारों को नकारने के सामान है |

Romeo -Juliet Clause की आवश्यकता क्यों ?

उपरोक्त अंतराष्ट्रीय दायित्वों और और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में Romeo -Juliet Clause केवल कानूनी सुधार का मामला नहीं, बल्कि  यह अब एक मानव अधिकार आवश्यकता बन गया है |

यह Clause 16 से 18 वर्ष की श्रेणी के किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को अपराधीकरण से बाहर रखकर बच्चों के मानव अधिकारों का संरक्षण करने में एक मजबूत सेतु की भूमिका अदा कर सकता है |  

निष्कर्ष :जब संरक्षण का कानून दमन का औज़ार बन जाए 

POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों का शोषण से संरक्षण करना है, लेकिन न्यायालयों, शोध अध्ययनो और विधि  विशेषज्ञों ने बार -बार स्पष्ट किया है कि सहमति आधारित किशोर संबंधों को भी कानून का दुरुपयोग करके अपराध में तब्दील किया जा रहा है, जो  कानून की मूल भावना के विपरीत है | 

ऐसे मामलों में Romeo -Juliet Clause आने से बच्चों के जीवन को बचाया जा सकता है | यह Clause एक आवश्यक मानव अधिकार सुधार हो सकता है तथा यह बच्चों के संरक्षण और दमन के बीच एक पुल का कार्य कर सकता है | “इस संदर्भ में यह भी देखें…

हालिया निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO के दुरूपयोग को रोकने का रास्ता साफ कर दिया है | सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी स्पष्ट करती है कि Romeo -Juliet Clause अब कोई विकल्प नहीं रहा है, बल्कि यह एक संवैधानिक और मानव अधिकार आवश्यकता बन गई है | 

“This issue raises serious concerns under India’s international human rights obligations, including the UNCRC and ICCPR.”

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs): 

प्रश्न 1. POCSO कानून का उद्देश्य क्या है ? 

उत्तर: POCSO कानून का उद्देश्य 18 वर्ष से काम आयु के बच्चों को यौन शोषण, दुर्व्यवहार और उत्पीड़न से बचाना है | इस क़ानून में बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त प्रावधान के साथ-साथ विशेष अदालतों की भी व्यवस्था की गई है |  

प्रश्न 2 . POCSO कानून के दुरपयोग की बातें क्यों उठ रही हैं ? 

उत्तर: POCSO कानून लागू होने के बाद भारतीय न्यायालयों में अनेक ऐसे मामले सामने आये हैं, जहाँ POCSO कानून का उपयोग सहमति आधारित किशोर या रोमांटिक संबंधों को आपराधिक मामला बनाने में किया गया है | इन मामलो को हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट ने POCSO कानून के उद्देश्यों के विपरीत माना है |   

प्रश्न 3. सुप्रीम कोर्ट ने POCSO के दुरुपयोग पर क्या टिप्पणी की है ?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट ने हालिया निर्णय में POCSO के दुरुपयोग पर चिंता जताई है तथा इस सम्बन्ध में माननीय न्यायालय ने भारत सरकार के विधि सचिव को निर्देश दिया कि वे विधायी सुधारों पर विचार करें, जिनमें सहमति-आधारित किशोर संबंधों को अपराधीकरण से मुक्त करने वाला Romeo–Juliet प्रावधान तथा साथ ही कानून का दुरुपयोग करने वालों के विरुद्ध जवाबदेही तय करने की व्यवस्था की जाए | 

प्रश्न 4 . Romeo -Juliet Clause क्या है ?

उत्तर : कई देशों में किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों को  क़ानून के अधीन कठोर आपराधिक दंड से मुक्त रखा गया है| इस कानूनी प्रावधान को ही Romeo -Juliet Clause के रूप में जाना जाता है | यह प्रावधान कई देशों में बाल संरक्षण के रूप में अपनाया गया है | अभी Romeo -Juliet Clause भारत में कानूनी तौर पर अस्तित्व में नहीं है |  

प्रश्न 5. भारत में Romeo -Juliet Clause की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर : क्यों कि अनेक POCSO मुकदद्मे सिर्फ अपना हिसाब बराबर करने के उद्देश्य से पजीकृत कराये जाते हैं, जबकि वे विशुद्ध सहमति से सम्बन्ध के मामले होते हैं | ऐसी स्तिथि में बच्चों का भविष्य आपराधिक मुकदद्मों में उलझ जाता है | इन अनावश्यक मुकदद्मों के कारण न्यायिक संसाधनों पर भी बोझ पड़ता है | 

प्रश्न 6. क्या सुप्रीम कोर्ट निर्देशित Romeo -Juliet Clause से बच्चों की सुरक्षा कमजोर होगी ?

उत्तर : नहीं | Romeo -Juliet Clause सिर्फ सहमति आधारित तथा गैर -शोषणकारी संबंधों को आपराधिक दायरे से बाहर रखेगा | इस क्लाज में शोषण, जबरदस्ती और शक्ति असमानता वाले मामलो में कोई छूट नहीं होगी | 

अस्वीकरण :

यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति,संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है | 

लेखक- Human Rights Guru ब्लॉग के सँस्थापक हैं | उनसे rkjassa1109@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।

ब्लॉग को फॉलो और शेयर करना न भूले | 

धन्यवाद |

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

डिजिटल अरेस्ट : मानव अधिकारों पर एक अदृश्य हमला

निःशुल्क विधिक सहायता और मानव अधिकार : भारत से वैश्विक मानकों तक

बच्चे, मानव अधिकार और संविधान: भारत अपने भविष्य के साथ क्या कर रहा है?

Latest Human Rights Analysis trusted by global legal, academic & policy readers