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POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, लेकिन विगत कुछ वर्षों से POCSO कानून के दुरुपयोग से गंभीर मानव अधिकार प्रश्न खड़े हो रहे हैं | क्या यह कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में बच्चों के अधिकारों के विरुद्ध बतौर एक हथियार उपयोग किया जा रहा है ?
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भारत में बाल संरक्षण कानूनों का उद्देश्य बच्चों को विशेष रूप से शोषण से बचाना रहा है |
विगत कुछ वर्षों से यह प्रश्न गंभीर होता जा रहा है कि बच्चों की यौन अपराधों से सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाया गया POCSO जैसा कानून अनेक मामलो में उनकी सुरक्षा और संरक्षण के बजाय उनके मानव अधिकारों पर हमले का औजार बनता जा रहा है |
क्योंकि विशेष रूप से 16 से 18 वर्ष के किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को अपराध बनाना स्पष्ट रूप से कानून और बाल मानव अधिकारों के बीच गंभीर टकराव को उजागर करता है |
बच्चों के मानव अधिकारों के सम्बन्ध में यह स्तिथि निश्चित रूप से चिंता का विषय है, जिसका समाधान समय रहते निकाला जाना आवश्यक है |
यह न सिर्फ एक सामाजिक समस्या है, बल्कि यह एक विधिक, मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का गंभीर मुद्दा है |
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POCSO Act, 2012 का मुख्य उद्देश्य नाबालिगों को लैंगिक अपराधों से बचाना है तथा अपराध होने पर उन्हें त्वरित व संवेदनशील तथा पुनर्वास की व्यवस्था के अलावा उनकी गोपनीयता को संरक्षित करना है |
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वर्तमान POCSO एक्ट के तहत 16 से 18 वर्ष आयु के नाबालिगों में सहमति से संबंधों को कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया गया है | किशोरों की सहमति का कोई मूल्य नहीं है |
इसी के परिणाम स्वरुप समस्या यह पैदा हुई कि किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को पोक्सो के अधीन अपराध मान लिया जाता है अर्थात किशोरों के बीच विशुद्ध प्रेमसंबंधों का भी जबरन अपराधीकरण किया जाता है | यह समस्या भारत में मानवाधिकार शिक्षा की कमी को भी दर्शाती है |
इस कठोर कानून का उपयोग कई बार लोगो द्वारा अपने पारस्परिक विवादों की खुन्नस निकालने के लिए किया जाता है और कभी सामाजिक नियंत्रण के रूप में किया जाता है |
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एक ओर जहाँ किशोर न्याय (बालको की देखभाल और संरक्षण ) अधिनियम, 2015(JJ Act, 2015 ) की धारा 15 के अधीन 16 से 18 वर्ष की आयु के अधिकाँश बच्चे प्राथमिक असेसमेंट के तहत पास हो जाते हैं और उन्हें प्रौढ़ अपराधियों की तरह मुकदद्मे के विचारण का सामना करने के लिए विवश होना पड़ता है |
वहीं दूसरी ओर POCSO एक्ट के तहत उनकी सहमति को कोई कानूनी मूल्य नहीं किया जाता है | POCSO एक्ट में सहमति पूर्ण संबंधों और शोषण पूर्ण संबंधों में स्पष्ट अंतर नहीं किया गया है |
यही समस्या बच्चों के मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है | सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में बतौर न्याय मित्र अदालत का सहयोग करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह ने स्पष्ट किया कि अधिकाँश किशोरों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता होती है |
उन्होंने यह भी कहा की बिना किसी गंभीर चिंतन और बहस के वर्ष 2013 में किशोरों में सहमति की उम्र 16 वर्ष को बढ़ा कर 18 वर्ष कर दिया गया था | इस सहमति की उम्र को बढाए जाने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं रहा है |
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बिना किसी वैज्ञानिक आधार के किशोरों में सहमति की उम्र 16 वर्ष से बढ़ा कर 18 वर्ष किया जाना ही अनेक पॉक्सो के मामलों में बच्चों के खिलाफ एक जटिल समस्या बन गई है |
एक ओर 18 वर्ष तक की आयु के बालकों को किशोर न्याय क़ानून के तहत संरक्षण दिया गया है जिसके तहत नाबालिक बच्चों को किसी अपराध के किये जाने की स्थति में दण्ड स्वरुप अधिकतम 3 वर्ष तक बाल सुधार गृह में रखे जाने का प्रावधान है |
वही दूसरी और किशोर न्याय कानून में धारा 15 जोड़कर 16 वर्ष से 18 वर्ष तक के किशोरों के लिए एक कठोर प्रावधान कर दिया| जिसे प्रिलिमनरी असेसमेंट कहते है |
इस श्रेणी में आने वाले किशोरों का एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाता जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वह किशोर अपराध की प्रकृति को समझने में सक्षम है या नहीं |
अनुभब बताते हैं कि अधिकाँश किशोर इस मनोवैज्ञानिक परीक्षण में पास हो जाते हैं | इस परीक्षण में पास होते ही उनका विचारण बतौर प्रौढ़ शुरू हो जाता है |
ऐसी स्थिति में उनके लिए प्रावधानित किसी भी अपराध के लिए दण्ड स्वरुप निर्धारित अधिकतम 3 वर्ष बाल सुधार गृह में रखे जाने की सीमा समाप्त होकर प्रौढ़ अपराधियों के लिए निर्धारित दण्ड की श्रेणी में तब्दील हो जाता है |
किशोर न्याय कानून के तहत बच्चों को अभिकथित परीक्षण से गुजरने के बाद अपराध की प्रकृति को समझने में सक्षम मान लिया जाता है अर्थात उसे मानसिक रूप से सामान्य प्रौढ़ के रूप में स्वीकार लिया जाता है |
वहीं दूसरी और POCSO के अधीन उसे आरोपी बनाये जाने पर उसकी परिपक्वता को कोई महत्व नहीं दिया जाता है क्यों कि सहमति से बने संबंधों में POCSO के तहत सहमति को कोई महत्व नहीं दिया जाता है |
बस POCSO कानून की यही कठोरता अनेक मामलों में बच्चों के मानवाधिकारों के विरुद्ध हथियार के रूप में प्रयोग की जा रही है |
मद्रास हाई कोर्ट की विधि व्यवस्था विजयालक्ष्मी बनाम राज्य, 2021 में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि POCSO का उद्देश्य किशोरों के सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों को अपराधी बनाना नहीं था।
मद्रास हाई कोर्ट की विधि व्यवस्था Sabari @ Sabarinathan v. Inspector of Police, 2019 में अदालत ने किशोर प्रेम संबंधों के मामलों में POCSO एक्ट को बिना सोचे-समझे लागू करने के खिलाफ चेतावनी दी।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध एवं अन्य (Criminal Appeal @ SLP (Crl.) 10656 of 2025) मामले में यह स्वीकार किया है कि POCSO के दुरुपयोग पर अदालतें पहले भी कई बार चिंता जाहिर कर चुकी हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए। अदालत ने कहा कि सरकार को ऐसे उपायों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जिनसे कानून के गलत इस्तेमाल को रोका जा सके।
विशेष रूप से, कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक ‘Romeo–Juliet’ Clause जैसा प्रावधान लाया जाए, ताकि वास्तविक और सहमति-आधारित किशोर संबंधों को कानून के कठोर दायरे से बाहर रखा जा सके। साथ ही, ऐसा तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई गई जिससे कानून का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत बदले या दुर्भावना से मुकदमे दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
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POCSO कानून लैंगिक अपराधों से किशोरों की सुरक्षा के लिए बना है ,लेकिन सहमति आधारित किशोर संबंधों में इस कानून का कठोर प्रयोग बच्चों की गरिमा, स्वतंत्रता और उनके सर्वोत्तम हित के मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए होता है |
इसी टकराव के चलते अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक निर्णय में किशोरों के मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार को POCSO कानून में ‘Romeo–Juliet’ Clause शामिल करने के लिए दिशानिर्देश दिए हैं, जिससे सहमति से सम्बन्ध बनाने वाले किशोरों को इस कठोर कानून के चुंगल से बचाया जा सके |
यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति,संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
✍️ Author Note:
Dr. R. K. JASSA is a legal researcher and human rights analyst focusing on child rights, constitutional safeguards, and misuse of criminal laws in India.
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धन्यवाद |
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बहुत शुक्रिया सर जी आपका 🙏🏼
जवाब देंहटाएंThanks.
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