Digital Arrest Scam in India: कानून, बचाव और शिकायत प्रक्रिया (2026)


Digital Arrest का दृश्य, जिसमें एक व्यक्ति साइबर निगरानी और ऑनलाइन धोखाधड़ी के बीच फँसा हुआ दिखाया गया है — मानव अधिकारों पर डिजिटल युग का अदृश्य हमला
Cradit:ChatGPT

परिचय 

आज कल एक तरफ डिजिटल तकनीकी ने हमारे जीवन को सुगम बनाया है वहीं दुसरी तरफ नयी चुनौतियों का सामना करने के लिए विवश कर दिया है | 

इन चुनौतियों में से एक है Digital Arrest | यह विषय आज के वैश्विक परिदृश्य के साथ-साथ देश के स्तर पर भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है |

साइबर अपराध की दुनिया में Digital Arrest नामक शब्द मानव अधिकारों के उल्लंघन का प्रतीक बन गया है तथा मानवअधिकारों के लिए भी गंभीर चुनौती है|   

भारतीय समाज में Digital Arrest का अपराध इतनी तेजी से फैला है जैसे अतीत में किसी समय स्माल पॉक्स की बीमारी फैला करती थी | 

भारत में Digital Arrest के अपराध की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को मन की बात के 115 वे एपीसोड में डिजिटल अरेस्ट के बारे में जनता को जागरूक करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा है | 

समाज में लोगों के साथ ठगी करना सभ्यताओं के विकास की शुरुआत से ही चला आ रहा है | हालांकि समय के साथ -साथ ठगने के तरीकों में आमूलचूक परिवर्तन आता रहा है | 

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वर्तमान के डिजिटल युग में तो ठगी और जालसाजी के तरीके पूरी तरह से बदल गए हैं तथा वे समय के साथ -साथ अत्यधिक आधुनिक और नए रूप में  समाज के सामने आ रहे हैं, और यह नया तरीका है Digital Arrest | 

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक(ADGP), उत्तर प्रदेश तथा फाउंडर डायरेक्टर ,उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ फॉरेंसिक साइंस ,लखनऊ ,प्रोफेसर (डॉ) जी.के. गोस्वामी, IPS के अनुसार Digital Arrest साइबर क्राइम का एक नया वेरिएंट है | वर्तमान परिदृश्य में उनका यह भी कहना है कि ऐसे मामले प्रति दिन बड़ी संख्या में हो रहे हैं कुछ लोग बता भी नहीं पाते | 

डिजिटल तकनीकी का विकास समाज की भलाई और जीवन को सरल बनाने के लिए किया गया है लेकिन यह भी सत्य है कि अपराधी हमेशा से ही अच्छी और उच्चस्तरीय तकनीकी का दुरूपयोग व्यक्ति और समाज के विरुद्ध तथा अपने हितार्थ करते आये हैं | 

आज के वैज्ञानिक और तकनीकी युग में जहाँ डिजिटल तकनीकी की उन्नति तेजी से हो रही है | वहीं अपराधियों द्वारा तकनीकी खामियों का लाभ उठाकर अनेक लोगों के साथ ठगी और जालसाजी की जा रही है | 

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यह साइबर अपराध एक भयाभय प्रबृति के रूप में डिजिटल तकनीकी की जानकारी रखने वाले नवयुवकों में तेजी से उभर कर सामने आया है |

इस प्रकार की जालसाजी और ठगी में ठग पीड़ितों को अवैध बित्तीय लेनदेन करने के लिए विवश करते हैं तथा धन की डिजिटल वसूली होने पर उन्हें उनके द्वारा किये गए आभासीय तथा मनगढंत अपराध से मुक्त करने का आश्वासन भी देते हैं | यही Digital Arrest का महत्वपूर्ण घटक है | 

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डिजिटल अरेस्ट क्या है ?

सामान्य भाषा में Digital Arrest का अर्थ है कि साइबर अपराधियों द्वारा स्वयं को पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर किसी व्यक्ति की ऑनलाइन गतिविधियों,उसके डाटा, और उसकी व्यक्तिगत जानकारी पर निगरानी और नियंत्रण कर उसे झांसे या भय में फँसा कर उससे ठगी या जालसाजी करना है | 

यद्धपि डिजिटल अरेस्ट की अभी तक कोई सर्वमान्य परिभाषा उपलब्ध नहीं है | इसका कारण विषय विशेषज्ञों द्वारा Digital Arrest के विषय का अन्तरविषयक(इंटरडिसिप्लिनरी) होना बताया है |  

डिजिटल अरेस्ट कोई वास्तविक गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि इसमें व्यक्ति डिजिटल उपकरण जैसे कि मोबाइल, लेपटॉप या इलेक्ट्रॉनिक टेबलेट आदि के माध्यम से बातचीत करने के दौरान पीड़ित ठगों के आभासीय गिरफ्त में रहते है | 

इस दौरान ठग या जालसाज पीड़ितों को किसी संगीन अपराध में फसाने या उन्हें  गिरफ्तार करने या उनके किसी परिवारीजनों या प्रियजनों को किसी अपराध में फ़साने का झांसा दे कर उनसे मनमानी रकम डिजिटल माध्यम से वसूलने का प्रयास करते हैं या वसूल कर लेते हैं | 

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क्या भारत में डिजिटल अरेस्ट कानूनी है?

भारत में Digital Arrest के सम्बन्ध में कोई भी कानूनी प्रावधान अभी तक उपलब्ध नहीं है | यदि किसी व्यक्ति को डिजिटल अरेस्ट के सम्बन्ध में कोई वीडियो या ऑडियो कॉल आती है तो निश्चित तौर पर वह एक ठगी या जालसाजी करने के लिए  की गयी कॉल है | 

दरअसल 1 जुलाई 2024 से लागू नए आपराधिक कानून में कानून लागू करने के लिए डिजिटल गिरफ्तारी करने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है | नए क़ानून में केवल सम्मन की सेवा का तथा इलेक्ट्रॉनिक मोड में कार्यवाही का प्रावधान किया गया है | 

डिजिटल अरेस्ट के सम्बन्ध में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने "मन की बात" के 155 वें एपीसोड में भारतीय जनता को सम्बोधित करते हुए कहा कि  Digital Arrest जैसी कोई व्यवस्था क़ानून में नहीं है | यह सिर्फ फ्रॉड है, फरेब है, झूठ है, बदमाशों का समूह है | 

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डिजिटल अरेस्ट के मामलों में फंसाने के तरीके क्या हैं ?

Digital Arrest के माध्यम से ठगने या जालसाजी करने के तरीके यद्धपि निश्चित नहीं हैं फिर भी कई अलग -अलग तरीकों से ठगी या जालसाजी को अंजाम दिया जाता है | 

पहले तरीके में अच्छे पढ़े लिखे और कानून के जानकार लोगों को अधिकांशतः मनी लॉन्डरिंग का डर दिखाकर फंसाया जाता है |

दूसरे तरीके में किसी व्यक्ति के कूरियर में ड्रग्स होने का भरोसा दिलाया जाता है | जिसकी वजह से उसे गंभीर अपराध में फंसने का डर दिखाया जाता है | 

तीसरे तरीके में व्यक्ति के बैंक के खाते से ट्रांजेक्शन्स में फाइनेंश्यिल फ्रॉड होने का डर दिखाया जाता है | 

चौथे तरीके में अधिकांशतः गरीब लोगों को, जिनके खाते में पैसे नहीं होते है, उन्हें लोन लेने वाला ऍप डाउनलोड करा दिया जाता है | बाद में उनको बसूली के लिए धमकाया जाता है और लोन के पैसे बापस करने को कहा जाता है, जो उन्होंने कभी उधार लिए ही नहीं | 

पाँचवा तरीका है जिसमे युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक आते है | इस तरीके में व्यक्ति अपने अंतरंग क्षणों को ऑनलाइन प्रस्तुत करने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है, जिसे दूसरे व्यक्ति द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है | 

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धीरे धीरे प्रस्ताव देने वाला व्यक्ति दूसरे का विशवास जीत लेता है और दूसरे को अपने वस्त्र उतारने के लिए उकसाता है | पहला वाला व्यक्ति इन्ही अंतरंग क्षणों की ऑनलाइन तस्वीरें या वीडिओ बना लेता है और उसके बाद प्रारम्भ होता है दूसरे व्यक्ति का Digital Arrest | 

दूसरे व्यक्ति द्वारा पैसे न देने की सूरत में उसकी अश्लील तस्वीरें या वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दी जाती है |

समय के साथ -साथ साइबर खतरों का क्षेत्र दिन पर दिन व्यापक होता जा रहा है | इस क्षेत्र में Digital Arrest की अवधारणा समाज के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में अत्यधिक तेजी से उभरी है | 

ठगी करने वाले स्वयं को क़ानून प्रवर्तन अधिकारी,जो पुलिस,सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन,आरबीआई, टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया आदि में से किसी के भी रूप में पेश कर सकते हैं, आवश्यकता अनुसार पीड़ितों को यह विस्वास दिलाते है कि उनके वैधानिक दस्तावेजों जैसे कि आधार कार्ड, बैंक खाते,आदि का अवैध रूप से उपयोग किया गया है | 

जिसके लिए उनके विरुद्ध तत्काल कानूनी कार्यवाही किये जाने का दबाब बनाया जाता है | जिन पीड़ितों ने कभी किसी कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं लगाए तथा वे किसी कानूनी लफड़े में नहीं पड़ना चाहते है, अपने विरुद्ध या अपने किसी परिवारीजन या किसी अजीज के विरुद्ध डिजिटल रूप से कानूनी कार्यवाही की बात सुनकर घबरा जाते है | इसके बाद शुरू होता है ठगों का पीड़ितों को पैसा देने के लिए मजबूर करने का सिलसिला | 

डिजिटल अरेस्ट के माध्यम से ठगने या जालसाजी करने के तरीके यहाँ बताये गए तरीकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साइबर अपराधी आये दिन नए -नए तरीके गढ़ रहे हैं | 

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डिजिटल अरेस्ट की कुछ हालिया घटनाएँ 

विगत कुछ वर्षों में Digital Arrest की घटनाओं की बाड़ सी आ चुकी है | जिनमे से कुछ घटनाओं का जिक्र यहाँ किया जा रहा है | 

गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 1 जनवरी 2023 से 31 दिसंबर 2023 की अवधि के दौरान भारत में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी  के कुल 1128265 प्रकरण दर्ज किये गए जिनसे जुडी कुल धनराशि 748863.9 लाख रुपये रही है |  

उत्तर प्रदेश के जिला आगरा निवासी शिक्षिका मालती वर्मा 30 सितम्बर, 2024 को अपने स्कूल में थी | दोपहर 12 बजे उसके मोबाइल पर फोन आया | फोन करने वाले ने बताया कि वह इंस्पेक्टर विजय कुमार बोल रहा है | 

उनकी बेटी रैकेट में पकड़ी गयी है| उन्हें  लड़की की आवाज सुनाई गयी | लड़की को जेल जाने से बचाना है तो 15 मिनट में एक लाख रूपये खाते में ट्रांसफर कर दो |अपनी बेटी को परेशानी में देख विमला वर्मा सदमे से बेहोश हो गयीं | परिवारीजन अस्पताल ले गए जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी | यह सब हुया Digital Arrest के कारण | यह रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया है | 

बेंगलूरु स्थित एक ७० वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार को साइबर ठगों ने 15 से 23 दिसंबर तक 8 दिन Digital Arrest में रहने की धमकी दी | ठगों ने अपना परिचय मुंबई पुलिस और सीबीआई के अधिकारी के रूप में दिया | 

पत्रकार को धमकी दी कि उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा यदि वह घर से बाहर निकला और उसे बताया गया कि उसके नाम पर ड्रग्स की एक खेप भेजी गयी है तथा उसके बैंक खातों का उपयोग हवाला लेनदेन के लिए किया गया है | ठगों ने उनसे 1.2 करोड़ की अवैध वसूली कर ली | 

एक अन्य मामले में 13 जुलाई 2024 को नोएडा की रहने वाली एक डॉक्टर पूजा गोयल को साइबर ठगों ने 48 घंटे तक Digital Arrest करके रखा | 

उसे पोर्न वीडियो स्कैम में शामिल होने का भय दिखा कर उससे 59 लाख रूपये ठग लिए । डॉक्टर को कॉल कर साइबर ठगों ने खुद को टेलीफोन रेगुलेटरी ऑफ़ इंडिया का कर्मचारी बताते हुए कहा कि उसके फोन से पोर्न वीडियो भेजे जा रहे है और इसके उसके गिरफ्तारी वारंट जारी होने की बात कही |

वह लगातार पोर्न वीडियो स्कैम में शामिल होने से इंकार करती रही | लेकिंग ठगों ने कहा कि उनके पास सबूत है | 

इसके बाद डॉक्टर गोयल डर गयी और ठगों द्वारा बताये गए खातों में रुपये ट्रांसफर कर दिए | इस घटना में Digital Arrest के सम्बन्ध में सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि इस घटना की पीड़िता एक उच्च शिक्षित व्यक्ति है |

डॉ. रुचिका टंडन उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी बिभाग में कार्यरत हैं | साइबर ठगों ने उन्हें कृष्णानगर में Digital Arrest कर लिया तथा उनसे 2.81 करोड़ करोड़ रूपये ठग लिए |

डॉ टंडन द्वारा पुलिस को दी गयी अपनी शिकायत में बताया कि 1 अगस्त 2024 को उनके फ़ोन पर किसी अज्ञात मोबाइल नंबर से कॉल आई | कॉल करने वाले ने स्वयं को टेलीफोन रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया का सदस्य बताया तथा सभी फोन्स की सेवाएं बंद करने की चेतावनी दी तथा बताया गया कि उनके मोबाइल सिम के बारे में उनके विरुद्ध कई शिकायते है | 

सीबीआई अफसर उनसे बात करेंगे | बातचीत के दौरान टंडन को बताया गया कि उनका नाम मनीलॉंड्रिंग के अपराध में सामने आया है तथा उनके खाते का उपयोग पैसा जमा करने के लिए किया गया जिसका उपयोग बच्चों और महिलाओं की तस्करी के लिए किया गया है | Digital Arrest के दौरान उसे आश्वासन दिया गया कि जांच में सहयोग पर  छोड़ दिया जाएगा | 

10 सितम्बर 2024 को हैदराबाद के एक सेवा निवृत सलाहकार ए वी मोहन राव को अज्ञात मोबाइल नंबर से कॉल आयी | जिसके बाद साइबर अपराधियों ने स्वयं को मुंबई पुलिस का अफसर बताते हुए Digital Arrest कर लिया | 

तथाकथित अफसर ने राव को बताया कि उसके आधार कार्ड की डिटेल और फोन नंबर मनीलॉन्ड्रिंग तथा पोर्नोग्राफी के वितरण से जुड़े हुए हैं | पीड़ित को फर्जी वारंट का भय दिखाकर उससे उसके बैंक खाते का नंबर साझा करने का दबाब बनाया गया और 2 करोड़ की ठगी कर ली | 

पिछले वर्ष  अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने Digital Arrest घोटाले पर स्वतः संज्ञान लिया है | जो निम्नवत है :IN RE: VICTIMS OF DIGITAL ARREST RELATED TO FORGED DOCUMENTS, SUO MOTO WRIT PETITION (CRIMINAL) No(s). 3/2025.

जिसमें  हरियाणा के Ambala से एक वरिष्ठ नागरिक दंपत्ति ने शिकायत की थी कि उसकी जीवन भर की बचत लगभग 1.5 रूपये की धोखाधड़ी है | 

दम्पति ने कहा कि यह धोखाधड़ी धोखेबाजों ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट और सूचना एवं संचार आयुक्तों का रूप धारण करके सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेश दिखाकर Digital Arrest करके की गई है | इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, दूर संचार विभाग और इलेक्टॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से विस्तृत कार्य योजना मांगी गई है |   

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डिजिटल अरेस्ट के प्रति संवेदनशील व्यक्ति और समुदाय कौन हैं ?

डिजिटल युग का सबसे बड़ा नुक्सान उन लोगो को उठाना पढ़ रहा जो डिजिटल तकनीकी के सामान्य ज्ञान या बेसिक शिक्षा से वंचित हैं या उम्र के ऐसे पड़ाव पर है कि प्रौढ़ शिक्षा के रूप में भी डिजिटल तकनीकी की बेसिक शिक्षा भी नहीं लेना चाहते है, जिससे स्वयं को डिजिटल अरेस्ट से बचा सकें |

यद्यपि Digital Arrest की अखबारों या मीडिया के माद्यम से समाज के सामने आयी घटनाओं से पता चलता है कि Digital Arrest की चपेट में अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग भी आ चुके हैं |

तकनीकी निगरानी के माध्यम से न सिर्फ पड़े लिखे लोगों को बल्कि ऐसे लोगों को भी Digital Arrest किया जा  रहा है, जो गोपनीय रूप से प्रौढ़ वैब साइट्स पर कंटेंट को पड़ने या देकने का शौक रखते हैं या विवाह सम्बन्धी साइट्स पर योग्य वर या वधु की तलाश में रहते हैं या डेटिंग साइट्स पर अपना समय बिताते हैं |

बच्चे मन के सच्चे होते है, बच्चों को भगवान् का रूप भी माना जाता है लेकिन साइबर अपराधियों के लिए Digital Arrest के मकसद से बच्चे सर्वाधिक आसान शिकार होते हैं |   

Digital Arrest के प्रति बच्चों का समुदाय अत्यधिक संवेदनशील पाया गया है | अधिकाँश मामलों में Digital Arrest में फंस चुके बच्चे किसी को कुछ नहीं बताते जब तक उनके सामने जीने मरने की नौबत नहीं आ जाती है या उन्हें या उनके परिजनों को जान से मारने की धमकी नहीं मिल जाती है | 

Digital Arrest के सम्बन्ध में मोबाइल या इंटरनेट पर गुमनामी से अपराध करने की स्तिथियाँ बच्चों की मासूमियत और डिजिटल तकनीकी के शातिरों द्वारा अपराध के लिए उपयोग के चलते बच्चों के लिए जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है |

डिजिटल दुनिया से जुड़ने के बाद बच्चों के लिए अपने माता-पिता और शिक्षकों से अधिक प्रिय और सच्चे मददगार, उन्हें बहलाने और फुसलाने वाले लगने लगते है | 

इसी स्थति का लाभ उठाते हुए साइबर अपराधी मासूम बच्चों को Digital Arrest की चपेट में ले लेते हैं | उसके बाद स्तिथियाँ बच्चों के माँ-बाप या अन्य परिजनों के हाथ से निकल जाती हैं | 

बच्चों के साथ Digital Arrest के रूप में साइबर बदमासी कई रूपों में होती है तथा यह आम बात होती जा रही है | 

इसमें बच्चे जब ऑनलाइन होते है उस समय दूसरे लोगों द्वारा बच्चों को धमकाए जाने की बहुत सम्भावनाये रहती हैं | 

डिजिटल अरेस्ट के कारण बच्चों के मानसिक, शारीरिक और शिक्षा सम्बन्धी प्रयासों पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ता है | बच्चे बिना किसी कारण के बेचैन और असहज लगने लगते हैं |

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डिजिटल अरेस्ट से मानव अधिकारों का उल्लंघन कैसे ?

Digital Arrest में साइबर अपराधियों का पहला कदम होता है शिकार बनाये जाने वाले व्यक्ति, उसके परिवार या इष्टमित्रों या रिश्तेदारों के बारे में जानकारी इक्क्ठा करना तथा दूसरा कदम होता हे डिजिटल तकनीकी जैसे व्हाट्स एप्प, स्काइपे या ऑडियो या वीडियो कॉल द्वारा पीड़ित से संपर्क करना | 

संपर्क करने के बाद तीसरा कदम होता है व्यक्ति पर गंभीर अपराधों के आरोप लगाकर उस पर मानसिक दबाब बनाना |

अंतिम या चौथा कदम होता है  पीड़ित को उन अपराधों से बचाने के लिए झांसा देना और उसके बदले में उनके द्वारा दिए गए बैंक खातों में जल्द से जल्द डिजिटल रूप में पैसे ट्रांसफर करने की धमकी |

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि Digital Arrest के प्रथम चरण में साइबर अपराधी शिकार बनाये जाने वाले व्यक्ति या परिजनों या इष्टमित्रों की पृष्टिभूमि के बारे में सोशल मीडिया या अन्य गैर कानूनी तरीके से व्यक्तिगत तथा गोपनीय जानकारियां इकट्ठा करते हैं | 

गोपनीयता  का अधिकार हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है | यह अधिकार भारतीय संविधान द्वारा सभी नागरिकों को मिला हुया है | 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी इसका समर्थन किया गया है | Digital Arrest के कारण गोपनीयता के अधिकार का सीधा -सीधा उलंघन होता है | 

जब किसी व्यक्ति की ऑनलाइन गतिविधियों की बिना उसकी अनुमति के निगरानी की जाती है या उसे गैर कानूनी रूप से हासिल किया जाता है तो यह उसके व्यक्तिगत जीवन मे दखल होता है तथा उसके गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन होता है | 

मानव अधिकार उल्लंघन की यह स्तिथि न सिर्फ व्यक्तिगत रूप में कष्ट और हानि पहुंचाने वाली है बल्कि समाज में भी भय का माहौल पैदा करती है | जनता पहले से ही अनेक प्रकार के आर्थिक अपराधों से जूझ रही है तथा Digital Arrest के रूप में नयी आफत सामने आ गई है |

मानव अधिकारों को सामान्यतः ऐसे अधिकारों के रूप में जाना जाता है जिनका उपयोग करने और जिनकी रक्षा करने की अपेक्षा करने का हकूक हर व्यक्ति को है | 

ये अधिकार हर व्यक्ति को उनके मानव होने के नाते प्राप्त हैं | विएना घोषणा के अनुसार सभी मानव अधिकार सार्वजनीन,अविभाज्य, अंतर्निर्भर और अन्तर्संबध  हैं |

अर्थात मानव अधिकार अंतर्निर्भर और अन्तर्संबध होने के कारण एक दूसरे को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं | गोपनीयता के मानव अधिकार का उल्लंघन व्यक्ति के अन्य कई अधिकारों पर सीधा असर डालता है | 

उदाहरण के लिए गोपनीयता के अधिकार के उल्लंघन से ही डिजिटल अरेस्ट के अधिकाँश मामलों में अनेक लोगों को जीवन भर की जमा पूंजी से वंचित होना पड़ता है जिससे पुनः जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन होता है | 

साइबर अपराधी डिजिटल अरेस्ट द्वारा व्यक्ति  को मनमाने ढंग से उसकी सम्पति से वंचित कर देते हैं जो कि मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुछेद 17(2) का सीधा उल्लंघन है जिसके अनुसार अनुसार किसी को भी मनमाने ढंग से उसकी सम्पति से वंचित नहीं किया जा सकता है | 

डिजिटल अरेस्ट के कारण पीड़ित को होने वाला आर्थिक नुक्सान उसके स्वास्थ्य को प्रत्यछ रूप से प्रभावित करता है | जिससे घोषणा के अनुछेद 25 में दिए गए स्वास्थ्य के अधिकार का उल्लंघन होता है| 

Digital Arrest के कारण ठगी होने के बाद अनेक लोग गरीबी के कुचक्र में फंसने के लिए विवश हो रहे हैं | 

गरीबी मानवाधिकारों का सर्वाधिक अतिक्रमण करती है |गरीबी के कारण भोजन के अधिकार,शिक्षा का अधिकार तथा आवास के अधिकार का भी उलंघन होता है | 

उपरोक्त से स्पष्ट है कि Digital Arrest व्यक्ति के कई मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार है | 

साइबर अपराधियों द्वारा Digital Arrest के रूप में कारित की गयी घटनाओं या अपराधों में पीड़ित या उसके परिजन या इष्टमित्रों के सम्बन्ध में कई रूपों में धमकियां दी जाती हैं | 

पीड़ित को कई- कई दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखा जाता है अर्थात पीड़ित को संविधान प्रदत्त स्वतंत्र विचरण की स्वंत्रता और जीवन के अधिकार का सीधा -सीधा उलंघन होता है | 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Ramaveer Upadhaya and Others v. State of Uttar Pradesh and Others, AIR 1996 All 131, निर्णय दिनांक 3 जुलाई 1995, के पैरा 10 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) और 21 के संदर्भ में कहा कि स्वतंत्र आवागमन तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में जीवन के प्रति भय और धमकी से मुक्त रहने का निहितार्थ शामिल है।

 न्यायालय ने टिप्पणी की कि मृत्यु के भय और धमकी के अधीन जीवन वास्तविक अर्थों में जीवन नहीं रह जाता। न्यायालय ने यह भी कहा कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने या पशुवत अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानव गरिमा के साथ शांतिपूर्वक जीने का अधिकार भी सम्मिलित है।

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति आसन्न खतरे की स्थिति में वह संबंधित प्राधिकारियों को नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक निर्देश देने की शक्ति रखता है। 

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डिजिटल साक्ष्य की अदालत तक पहुंचने की प्रक्रिया क्या है ?

अदालत में प्रस्तुत करने के लिए डिजिटल साक्ष्य की एक प्रक्रिया होती है | इस प्रक्रिया के कई चरण है | जिसके तहत डिजिटल साक्ष्य को सर्व प्रथम पहचानना पड़ता है | उसके बाद उसका संकलन किया जाता है | फिर उसे संरक्षित किया जाता है | 

अंत में डिजिटल साक्ष्यों को मौजूदा आपराधिक प्रक्रियात्मक कानून और तकनीकी के अनुसार अदालत में प्रस्तुत किया जाता है | क़ानून का यह स्वरुप साक्ष्य और आपराधिक प्रक्रिया के नियमो को निर्धारित करता है तथा उसे प्रमाणिकता प्रदान करता है |

किसी अपराध का सुबूत प्रदान करने में सूचना अवं संचार प्रौद्योगिकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | सूचना अवं संचार प्रौद्योगिकी से प्राप्त डेटा को न्यायलय में उपयोग में लाया जा सकता है |इसी को डिजिटल साक्ष्य या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कहते हैं |

इन सबूतों को पहचाने,संकलन करने,संरक्षण करने तथा विश्लेषण कर उन्हें क़ानून की अदालत में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को डिजिटल फॉरेंसिक के रूप में जाना जाता है | 

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग करने वाला व्यक्ति अक्सर अपने पीछे डिजिटल निशाँन छोड़ देता है | ये  डिजिटल निशान उपयोगकर्ता द्वारा छोड़े गए डेटा के रूप में होते हैं जो उसके बारे में अनेक प्रकार की जानकारी दे सकता है | जैसे कि आयु ,जाती,लिंग ,राष्ट्रीयता, रंग, नस्ल, मूलवंश, चिकत्सकीय इतहास आदि | 

सूचना अवं संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से डिजिटल चिन्ह के रूप में छोड़े गए डेटा सक्रिय और निष्क्रिय दो रूपों में मिलते है | 

निष्क्रिय डिजिटल चिन्ह के रूप में डिजिटल तकनीकी के उपयोगकर्ताओं द्वारा ब्रॉजिंग हिस्ट्री एक अच्छा उदाहरण है | 

जबकि सक्रीय डिजिटल चिन्ह उपयोगकर्ताओं द्वारा प्रदान किये गए डेटा के रूप में होते हैं, जिसमें चित्र, वीडियो, निजी जानकारी, एप्स, वेबसाइट पर अपलोड की गयी सामिग्री समाहित है |

सक्रिय और निष्क्रिय डिजिटल चिन्ह  के रूप में डेटा का उपयोग साइबर अपराध के अलावा अन्य अपराध के साक्ष्य के रूप में भी किया जा सकता है | 

इस डेटा का उपयोग किसी अपराध के साबित करने या उसके खंडन करने की लिए भी किया जा सकता है | 

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डिजिटल साक्ष्य की अदालत में स्वीकार्यता के आधार क्या हैं ? 

डिजिटल साक्ष्यों को अदालत में प्रस्तुत किया जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण है उन्हें प्रमाणिकता के साथ अदालत में प्रस्तुत कर उन्हें स्वीकार करना |यद्धपि विधि अनुसार यह सही है कि डिजिटल साक्ष्य को स्वीकार या अस्वीकार करना न्यायिक विवेक पर निर्भर होता है |

भारत में 1 जुलाई 2024 से नया साक्ष्य अधिनियम अर्थात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (बीएसए) लागू हो गया है| जिसमे डिजिटल साक्ष्य से सम्बंधित प्रावधान नए और व्यापक रूप में लाये गए हैं |

बीएसए में दी गयी "दस्तावेज" की परिभाषा में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को भी शामिल किया गया है | 

इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल दस्तावेज में इ-मेल, सर्वर लॉग,कंप्यूटर पर दस्तावेज,लेपटॉप या स्मार्ट फोन, मैसेज, वेबसाइट,अवस्थिति साक्ष्य में इलेक्ट्रॉनिकी अभिलेख और डिजिटल युक्तियों में भण्डार किये गए वॉयस मेल मैसेज समाहित हैं | 

बीएसए की धारा 61 के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल दस्तावेज साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होंगे तथा इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल दस्तावेज भी वही विधिक प्रभाव, विधिक मान्यताऔर प्रवर्तनशीलता रखेंगे जो कोई अन्य दस्तावेज रखता है| 

इसी एक्ट की धारा 63(4) इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणिकता पर बल देती है | जिसके लिए एक प्रमाण -पत्र की आवश्यकता होती है | 

इस प्रमाण -पत्र पर कंप्यूटर या संचार-युक्ति या सुसंगत क्रियाकलाप के प्रबंध, जो भी समुचित हो, के भारसाधक और विशेषज्ञ के हस्ताक्षर होने चाहिए तब डिजिटल साक्ष्य न्यायालय में स्वीकार्य योग्य माना जाएगा, अन्यथा की स्थति में नहीं | 

यद्धपि कानूनी रूप से किसी की आडियो -वीडियो रिकॉर्डिंग करना अपराध की श्रेणी में आता है लेकिन बीएसए के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में रिकॉर्डिंग करना भी अनिवार्य बनाया गया है | उदाहरण के तौर पर अपराध स्थलों पर या यौन अपराधों के पीड़ित प्रकरणों में | 

बीएसए में डिजिटल साक्ष्यों को दस्तावेजी साक्ष्यों के बराबर का दर्जा देने का उद्देश्य कानूनी प्रक्रिया को सरलता प्रदान करना है | यधपि, डिजिटल साक्ष्यों को बिना पुख्ता डेटा प्रोटेक्शन क़ानून के लागू करना भी गोपनीयता के मानवाधिकार के लिए चिंता का सबब है |   

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डिजिटल अरेस्ट की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार के प्रयास प्रयास क्या हैं ? 

सरकार साइबर अपराध के नए रूप Digital Arrest से लड़ने के लिए सचेत और चिंतित  है | इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को मन की बात के 115 वे एपिसोड में डिजिटल अरेस्ट विषय पर भारतीय जनता को सम्बोधित करना पड़ा तथा उससे बचने के उपाय के रूप में  जनता को रुको -सोचो -एक्शन लो नामक  मंत्र दिया गया | 

प्रधान मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन का एक नंबर 1930 जारी किया गया है जिस पर कोई भी पीड़ित या उसकी ओर से किसी भी प्रकार के साइबर अपराध के सम्बन्ध अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है | 

इसके अलावा एक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल https://cybercrime.gov.in भी प्रारम्भ किया गया है, जिस पर Digital Arrest से पीड़ित व्यक्ति अपनी ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकता है | 

साइबर अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण पाने के लिए केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों और केंद्र साशित प्रदेशों से मिलकर काम कर रही है | जिसके लिए सरकार ने नेशनल साइबर को आर्डिनेशन सेंटर की स्थापना भी की है | 

साइबर अपराध जिसमें Digital Arrest भी शामिल है, के बारे में एसएमएस,सोशल मीडिया अक्स (पूर्व में ट्विटर)@ साइबरदोस्त, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम आदि के माध्यम से जन-जागरूकता फैलाने के लिए केंद्र सरकार गंभीरता से प्रयासरत है | 

गृह मंत्रालय द्वारा साइबर धोखाधड़ी के मामलों पर 6 फ़ेरबरी 2024 को जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार भारत सरकार द्वारा 3.2 लाख से अधिक सिम कार्ड और 49,000 IMEI ब्लॉक किए गए हैं।

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डिजिटल अरेस्ट से बचाव के उपाय क्या हैं ? 

साइबर अपराध के क्षेत्र में ठगी और जालसाजी के लिए "Digital Arrest" को हतियार के रूप में उपयोग की समाज में एक बाढ़ सी आ गयी है, जो तत्काल मानव अधिकार संरक्षण हेतु निवारण उपायों और सार्वजनिक जागरूकता की मांग करता है | 

सार्वजनिक जागरूकता में आपराधिक न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशाशन से लेकर  डिजिटल शिक्षा से वंचित हर आम नागरिक शामिल है |   

कोई भी व्यक्ति व्हाट्स- ऍप कॉल की अपनी डीपी पर पुलिस की वर्दी में किसी व्यक्ति का फोटो लगाकर या साधारण काल के जरिये किसी अनजान नंबर से काल करके फ़साने का प्रयास करे और किसी को न बताने की बात कहे तो तत्काल काल कट करके बिना घबराये पुलिस या परिवारीजन या परिचित को  सूचित करें | 

प्रोफेसर (डॉ) जी.के. गोस्वामी, IPS का कहना है कि जब आपने कोई अपराध किया ही नहीं है तो डर किस बात का है |  

साइबर अपराधी साधारण कॉल या व्हाट्स- ऐप या वेबसाइट या किसी एप्लीकेशन आदि के माध्यम से धमकाकर, झांसा देकर या आपके किसी परिजन के संकट में होने की सूचना देकर या जालसाज कहते है कि मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग तस्करी में आपकी संलिप्तता पाई गई है और आपको Digital Arrest  करने का प्रयास कर सकते हैं | ऐसी स्थती में तत्काल पुलिस को सूचना या संपर्क करना चाहिए| 

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यदि कोई अपरिचित काल करने वाला आपके पुत्र या पुत्री के किसी रैकेट या यौन अपराध में फसने और उसे अरेस्ट करने की बात कहता है तथा तुरंत रूपये भेजने पर उन्हें छोड़ने का आश्वासन देता है तो तुरंत समझ जाना चाहिए कि कॉल साइबर ठगों या जालसाजों की है | 

डिजिटल तरीके से ठगी या जालसाजी करने वाले अपराधी पीड़ित व्यक्ति को किसी अपराध से बचाने के ऐवज में रूपये की मांग करते हैं | 

मोबाइल इंटरनेट पर अपनी निजी जानकारियों को साजा करने से तथा संदिग्ध  लिंक पर क्लिक करने और अज्ञात और अपुष्ट श्रोतों से उससे अटैच्ड फाइलें डाउनलोड करने से बचें | 

डिजिटल अरेस्ट करने वाले साइबर अपराधी पीड़ित को कॉल करके स्वयं को सीबीआई ,एनआईए या किसी अन्य विभाग में अधिकारी आदि बताकर ठगीका गैरकानूनी कारोबार करते हैं |

अक्सर देखा गया है कि 92 कोड वाले नंबर से Digital Arrest के लिए कॉल्स की जाती है इसलिए इस कोड वाली काल को नदरअंदाज करें |  

पुलिस विभाग में Digital Arrest जैसा कोई विधिक प्रावधान नहीं है | इसलिए पुलिस कभी भी लोगों को कॉल करके डिजिटल अरेस्ट नहीं करती है |

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने "मन की बात" में Digital Arrest से बचने के लिए सरल उपाय के रूप में डिजिटल सुरक्षा के तीन चरण बताये | ये चरण हैं -रुको- सोचो-एक्शन लो | 

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निष्कर्ष 

वर्तमान समय में जरायम पेशे अर्थात आपराधिक कारोबार की दुनिया का सिरमौर शब्द  Digital Arrest का व्यक्ति, परिवार, समाज और सरकार पर गहरा और व्यापक असर दृष्टिगोचर हो रहा है | 

यह न सिर्फ आभासीय बल्कि वास्तविक रूप में भी व्यतिगत स्वंत्रता को सीमित कर रहा है बल्कि समाज के लोकतांत्रिक ढाँचे को भी कमजोर कर रहा है | 

इस लिए यह आवश्यक है कि इस मुद्दे के निराकरण के सम्बन्ध में बिना समय गवाए हर मोर्चे पर ध्यान दिया जाए और नागरिकों की Digital Arrest से रक्षा के लिए हर स्तर से और हर संभव कानूनी और नीतिगत पुख्ता कदम उठाये जायें | 

डिजिटल दुनिया में Digital Arrest से मानव अधिकारों की रक्षा के लिए एक समर्पित और मानवाधिकार केंद्रित समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है,ताकि सभी लोग स्वंत्रता और गोपनीयता के मानवअधिकार के साथ जी सकें |  

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: Digital Arrest क्या है ?

उत्तर :Digital Arrestएक नए किस्म का साइबर अपराध है | इसमें साइबर अपराधी खुद को पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं और पैसे ऐंठने की कोशिश करते हैं। यह एक प्रकार की ठगी या जालसाजी के लिए किया जाता है |

प्रश्न 2: यदि कोई संदिग्ध कॉल आये तो क्या करें ?

उत्तर : यदि कोई संदिग्ध काल आये तो  पहले रुकें  फिर सोचें  उसके बाद एक्शन ले अर्थात परिजनों या पुलिस को सूचित करें 

प्रश्न 3: मुझे सबूत जुटाने के लिए क्या करना चाहिए ?

उत्तर : संदिग्ध काल आने की बाद आप मोबाइल या लेपटॉप स्क्रीन का स्क्रीन शॉट ले सकते हैं तथा ऑडियो या वीडियो काल होने की स्तिथि में उसे रिकॉर्ड भी कर सकते हैं | 

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अस्वीकरण :

यह Blog केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

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Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

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 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality


नोट: यह लेख 2026 में अद्यतन (Updated in 2026) किया गया है ताकि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े नए पहलुओं को शामिल किया जा सके। लेख का उद्देश्य केवल शैक्षणिक और विश्लेषणात्मक है |



 

 










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