राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026: भारत में मानव अधिकार चुनौतियाँ
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क्या कोर्ट में AI से निर्मित लिखित दलीलें पेश करना अब वकीलों के लिए जोखिम बन चुका है ?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में स्पष्ट सन्देश दिया है, कि कोर्ट में बिना तस्दीक किए AI से निर्मित दलीले प्रस्तुत करना न सिर्फ गैर -पेशेवर है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ भी है | इसी गैर -जिम्मेदाराना कार्य पर अदालत ने रू 50000 का जुर्माना ठोंक दिया |
विगत कुछ समय से न्याय व्यवस्था में वकीलों द्वारा AI (Artificial Inteligence) का उपयोग धड़ल्ले से किया जाने लगा है | बॉम्बे हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले ने न्याय व्यवस्था के लिए चेतावनी भरे संकेत दिए हैं |
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यह मामला मुंबई स्थित एक फ्लैट से सम्बंधित है, जिसे Leave and Licence के कानूनी प्रावधान के तहत दिया गया था|
इस मामले में सक्षम प्राधिकारी ने बेदख़ली का आदेश जारी कर दिया था | लेकिन प्रतिवादी ने एक याचिका डालकर उसे चुनौती दी थी |
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| Credit:Google Gemini |
यह याचिका ही आगे चल कर AI/ChatGPT के लापरवाही पूर्ण उपयोग के कारण वकील की लापरवाही का सबब बनी है | जिस पर हाई कोर्ट द्वारा कडा रूख अपनाया गया है |
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रतिवादी को निर्देश दिया जाता है कि वह आज से दो सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय कर्मचारी चिकित्सा कोष में 50,000 रुपये का खर्च अदा करे और भुगतान का प्रमाण रजिस्ट्री में जमा करे।
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कोर्ट के समक्ष पत्रावली पर उपलब्ध प्रतिवादी के लिखित प्रस्तुति के अवलोकन ने न्यायालय को संदेह में डाल दिया |
प्रतिवादी की लिखित प्रस्तुति के अवलोकन के बाद न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुति में हरे बॉक्स बने हैं जिस पर टिक मार्क हैं, बुलेट पॉइंट और एक ही बात को बार बार दुहराया जाना अंकित है |
यह प्रस्तुति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि ये दस्तावेज ChatGPT या उसी तरह के किसी AI टूल से तैयार थे | अदालत ने कठोर शब्दों में कहा कि यह अदालत ऐसी प्रथाओं को बर्दाश्त नहीं करेगी और इसके परिणामस्वरूप जुर्माना लगाया जाएगा।
यदि कोई वकील ऐसी प्रथा में लिप्त पाया जाता है, तो बार काउंसिल को मामला सौंपने जैसी और भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
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न्यायालय के अनुसार, AI के उपयोग की शंका उस समय अधिक प्रबल हो गई जब प्रतिवादी द्वारा न्यायालय में दाखिल कथित विधि व्यवस्था ज्योति पत्नी दिनेश तुलसियानी बनाम एलिंगेट असोसिएट्स को खोजा गया |प्रतिवादी ने इस विधि व्यवस्था का कोई भी साइटेशन नहीं दिया था और न ही निर्णय की प्रति लगाईं थी |
न्यायालय तथा कोर्ट क्लर्क्स द्वारा उसे खोजने का अथक प्रयास किया गया, लेकिन न्यायालय ने पाया की यह विधि व्यवस्था अस्तित्व में ही नहीं है | न्यायालय ने पाया कि इसके कारण अमूल्य समय की बर्बादी हुई है |
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इस मामले में प्रतिवादी द्वारा न्यायालय में लिखित प्रस्तुति में न्यायालय द्वारा AI के उपयोग की पहचान की गई तथा फर्जी विधि व्यवस्था को भी लिखित प्रस्तुति में पकड़ा गया |
इस सम्बन्ध में न्यायालय का स्पष्ट और संतुलित मत रहा है कि AI टूल के उपयोग से न्यायालय को कोई आपत्ति नहीं है उसका स्वागत है, लेकिन AI टूल का उपयोग करने वाले पक्षकार की जिम्मेदारी है कि वह उन विधि व्यवस्थाओं की पुष्टि करे कि प्रस्तुत सामिग्री प्रामाणिक, सुसंगत और वास्तव में अस्तित्व में हो |
अदालत ने कहा कि प्रतिवादी की ओर से लिखित प्रस्तुतियां बिना किसी जाँच के दाखिल कर दी, जो कि गैर -जिम्मेदाराना पेशेवर कृत्य है |
न्यायालय ने कठोर चेतावनी देते हुए इस प्रवृति को बेहद खतरनाक बताया और साथ ही कहा कि अदालत में बिना जाचे-परखे सामिग्री को प्रस्तुत करना, अदालत को असुसंगत सामिग्री और फर्जी अस्तित्वहीन विधि व्यवस्थाओं से गुजरने के लिए विवश करना न्याय के त्वरित वितरण में बाधा है |
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की प्रबृति को प्रारम्भ में ही कुचला जाना चाहिए |
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बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक नजीर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण अधिवक्ता समाज के लिए एक चेतावनी भी है |
बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि AI का स्वागत है, लेकिन अधिवक्ताओ को न्यायालय में किसी प्रकार की AI जनरेटेड लिखित सामिग्री दाखिल करने से पहले भली -भाँती तस्दीक कर लेनी चाहिए |
AI अधिवक्ता का स्थान नहीं ले सकता है, यदि अधिवक्ता AI का प्रयोग व्यवसायिक गैर-जिम्मेदारी के साथ करता है तो उसे अदालत के गुस्से और सख्त कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है | जैसा की अदालत ने इस मामले में 50, 000 रूपये का जुर्माना लगाया है |
यह निर्णय नई पीढ़ी के अधिवक्ताओं के लिए एक सीख है | विधि व्यवसाय एक महान पेशा है, इसमें पेशेवर गैर -जिम्मेदारी के लिए कोई स्थान नहीं है |
प्रश्न 1: बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्यों लगाया रु 50 000 का जुर्माना ?
उत्तर : क्यों कि वकील द्वारा प्रतिवादी की ओर से अदालत में ChatGPT जैसे AI टूल से तैयार लिखित सामिग्री प्रस्तुत की थी | जिसमे अस्तित्वहीन अर्थात फर्जी विधि व्यस्था का हवाला दिया गया था | इसे खोजने में न्यायालय का बहुमूल्य समय बर्बाद हुया |
प्रश्न 2 :अदालत ने कैसे पहचाना कि प्रतवादी द्वारा प्रस्तुत सामिग्री AI टूल से बनी हैं ?
उत्तर :अदालत ने पाया की लिखित प्रस्तुति में AI टूल जैसी सामिग्री के संकेत हैं | हरे बॉक्स पर टिक मार्क तथा बुलेट पॉइंट का असमान्य प्रयोग किया गया है | जो सामान्य रूप से AI -जनरेटेड सामिग्री से समानता रखते हैं |
प्रश्न 3 : वकील द्वारा प्रस्तुत सामिग्री में कौन सी विधि व्यवस्था फर्जी (अस्तित्वहीन )पाई गई ?
उत्तर : प्रस्तुत सामिग्री में ज्योति पत्नी दिनेश तुलसियानी बनाम एलिगेंट एसोसिएटस नामक विधि व्यवस्था फर्जी पाई गई | अदालत और क्लर्कों द्वारा व्यापक खोज के बाबजूद वह अस्तित्व में नहीं पाई गई |
प्रश्न 4 :क्या अदालत ने AI के उपयोग पर पूरी तरह रोक लगा दी है ?
उत्तर :अदालत द्वारा AI के उपयोग पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाईं है | न्यायालय ने चेताया है कि AI का स्वागत है, लेकिन उसके प्रयोग से उत्पन्न सामिग्री को न्यायालय में प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी जिम्मेदारी के साथ स्वयं पुष्टि कर लें |
प्रश्न 5 : क्या वकीलों के खिलाफ आगे और कार्यवाही हो सकती है ?
उत्तर : हाँ | अदालत ने चेताया है कि भविष्य में ऐसी पेशेवर गैर -जिम्मेदारी पाए जाने पर मामले को वकील के विरुद्ध कार्यवाही हेतु बार कौंसिल को भी भेजा जा सकता है |
प्रश्न 6 :यह फैसला वकीलों के लिए क्या सन्देश देता है ?
उत्तर : यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि AI वकीलों के लिए सहायक हो सकता है, लेकिन वकील के स्वयं के विवेक और पेशेवर -जिम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकता है |
प्रश्न 7 : क्या यह फैसला भविष्य में AI -आधारित कानूनी प्रैक्टिस को प्रभावित करेगा ?
उत्तर :हाँ ,यह फैसला निश्चित रूप से AI - आधारित कानूनी प्रैक्टिस को प्रभावित करेगा क्यों कि यह वकीलों में AI के अन्धाधुन्ध प्रयोग पर रोक लगाएगा तथा वकीलों को मुकदद्मे के तथ्यों की पुष्टि के लिए मजबूर करेगा तथा व्यवसायिक जिम्मेदारी के लिए प्रोत्साहित करेगा |
यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति,संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Dr. R. K. JASSA is a legal researcher and human rights analyst focusing on child rights, constitutional safeguards, and misuse of criminal laws in India.
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