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जनरेटिव एआई और मानवाधिकार: चैटजीपीटी के बढ़ते प्रभाव का विश्लेषण

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Image by  Markus Winkler  from  Pixabay प्रस्तावना  आजकल जनरेटिव आर्टिफिशल इंटेलिजेंस(AI) तकनीक, विशेषकर चैटजीपीटी जैसे औजारों का मानवीय जीवन में महत्व बहुत बढ़ गया है |  यह तकनीकी मनुष्य के जीवन, कार्य और उसके संवाद तथा भाषा को बदल  रही  हैं | समय के साथ इस तकनीकी में जितना बदलाव आ रहा है, उसी तरह मानव अधिकारों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएँ भी तेजी से बढ़ रहीं हैं |   प्रश्न उठ रहा है कि क्या चैट जीपीटी जैसी अत्याधुनिक आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकी मनुष्य के लिए केवल मददगार है ? या मनुष्य  की  गोपनीयता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और रोज़गार जैसे मौलिक अधिकारों  के लिए खतरे की एक घंटी है ? इस लेख में हैं हम समझने का प्रयास करेंगे कि जनरेटिव एआई कैसे मानव अधिकारों को प्रभावित कर सकता है ? भविष्य में मानव अधिकार उलंघन रोकने के लिए हम क्या -क्या कदम उठा सकते हैं ?  इसके अतिरिक्त भविष्य में  कैसे जनरेटिव एआई का भी मानव हित में भरपूर उपयोग कर सकें ? यह भी पढ़ें  : डिजिटल अरेस्ट : मानव अधिकारों पर एक अदृश्य...

Adolescence ड्रामा: कैसे सोशल मीडिया और विषाक्त मर्दानगी मानव अधिकारों के लिए खतरा बन रहे हैं ?

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  Source:Netflix's Promotional Photo   प्रस्तावना  कल्पना कीजिये ---एक 13 वर्षीय किशोर, अपने स्कूल की एक सहपाठी छात्रा की ह्त्या के आरोप में फँस जाता है |  उसका न कोई आपराधिक इतिहास है, न वह हिंसा से प्रेरित है और न वह आपराधिक मंसा रखता है |  फिर अचानक यह जघन्य अपराध की कहानी घटित क्यों होती है ? इसके पीछे है उसका हर दिन फ़ोन की स्क्रीन पर स्क्रॉल करना, Manosphere जैसी परम्परागत सोच से प्रभावित होना |  जिसे आज के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और हवा देकर आग में घी डालने का काम कर रहे हैं |   सयुंक्त राष्ट्र महिला वेबसाइट के अनुसार ऑनलाइन स्त्री-द्वेष स्कूलों, कार्यस्थलों और अंतरंग संबंधों में भी अपनी जगह बना रहा है। विश्व भर में  5.5 अरब से ज़्यादा लोग ऑनलाइन हैं – और 5.2 अरब से ज़्यादा लोग सोशल मीडिया पर भी  हैं  –  Image by  Oleksandr Pidvalnyi  from  Pixabay डिजिटल स्पेस आम आदमी के लिए सीखने और डिजिटल संपर्क का केंद्र बिंदु बन गया है।  एक ओर इंटरनेट के फायदे हैं, वहीं दूसरी ओर इसका उपयोग पारस्परिक नफ़रत, गाली-...

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