UGC 2026 Regulations: उच्च शिक्षा सुधार का नया युग क्यों?
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| Source:Google Gemini |
भारत में हाथ से मैला ढोना (Manual Scavenging) केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह मानव अधिकारों पर सीधा हमला है |
इस समस्या का उन्मूलन करने के लिए वर्ष 2013 में संसद ने मैला ढोने का प्रतिषेध एवं पुनर्वास अधिनियम पारित किया था |
इस क़ानून का उद्देश्य स्पष्ट था -हाथ से मैला ढोने पर पूर्ण प्रतिषेध तथा प्रभावित परिवारों की पहचान कर उनके लिए पुनर्वास जिसमे वैकल्पिक रोजगार के लिए ऋण सुविधा, कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की शिक्षा के लिए सुविधाएं देकर उनके जीवन को मानवीय गरिमा प्रदान करना |
हाथ से मैला ढोने की अमानवीय व्यवस्था में इंसानो को जाम हो गए नाले और मेनहॉल को साफ़ करने तथा खोलने के काम में लगाया जाता है | इस कार्य में उन्हें मलमूत्र और अन्य गंदगी से भरे मलवे और पानी में पूरी तरह डूबने पर मजबूर होना पड़ता है |
परिणाम स्वरुप अक्सर इस काम के दौरान लोगो की जहरीली गैसों की चपेट में आने से मृत्यु हो जाती है | सफाई की यह बहुत भीभत्स अमानवीय प्रक्रिया है |
लेकिन दुर्भाग्य से 21वीं सदी का एक चौथाई समय गुजरने के बाद भी आज के सभ्य समाज में यह अमानवीय प्रथा अभी भी अस्तित्व में है - क्या कानून धरातल पर उतरा है ?
कानून उपलब्ध होने के बाबजूद इस समस्या को समाप्त करने में सफल क्यों नहीं हुए ? यह एक चिंतनीय विषय है | इस समस्या पर कानून बनने के बाद एक सांसद को लोकसभा में सरकार के समक्ष प्रश्न क्यों उठाना पड़ रहा है ? सभी के लिए सोचनीय विषय है |
हाल ही में शिवसेना के सांसद राजभाऊ वाजे ने लोकसभा में मैला ढोने का प्रतिषेध एवं पुनर्वास अधिनियम के सम्बन्ध में सरकार द्वारा किये जा रहे अमल के बारे में सरकार को कटघरे में खड़ा किया तथा उन्होंने कहा कि क़ानून आज भी कागजों तक सीमित है |
उनका कहना था कि क़ानून के तहत पुनर्वास का लाभ लाभार्थिओं तक नहीं पहुंच रहा है | प्रश्न उठता है कि कानून की क्रियान्वन की जिमेदारी कौन लेगा ?
कानून के क्रियान्वयन की यह अत्यधिक निराशाजनक स्थति केवल सरकारी अमले की विफलता को नहीं दर्शाता है, बल्कि यह मानवाधिकारों का गंभीर उलंघन है |
भारतीय संविधान का अनुछेद 21 हर व्यक्ति को गरिमामयी जीवन व्यतीत करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है | बाबजूद इसके आज भी समाज का एक वंचित वर्ग आधुनिक तकनीकी के दौर में भी नालियों, सीवर और गटरों में उतरने को विवश किया जाता है | ऐसी स्थति में संविधान द्वारा प्रदत्त यह मौलिक अधिकार व्यर्थ हो जाता है |
मेनका गांधी बनाम भारत संघ 1978 में सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया है कि भारतीय संविधान के अनुछेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वंत्रता का अधिकार पशुवत जीने का नहीं है ,बल्कि सम्मान के साथ जीवन जीने का है
यही नहीं क़ानून को बने 10 वर्ष से अधिक हो गए, लेकिन उसके उचित क्रियान्वयन के बिना वह भी अर्थहीन हो जाता है |
Human Rights Guru ब्लॉग पर पहले प्रकाशित लेख में भी स्पष्ट किया गया है कि क़ानून के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी संस्थाओं की निष्क्रियता के कारण हाथ से मैला ढोना मानव अधिकार उलंघन बन चुका है | मैला ढोने के दौरान मृत्यु के कई मामलों में पुनर्वास के रूप में मुआवजे के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखना पड़ा है |
सांसद राजभाऊ वाजे ने यह भी कहा है कि सरकार ने स्वछता और सीवर सफाई के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी आधारित मशीनीकरण में दिलचपी न दिखाने पर अवसोश जाहिर किया |
यदि मैला ढोने की अमानवीय और शोषणकारी प्रथा को मानव अधिकार दृश्टिकोण से देखा जाए तो आज के उन्नत तकनीकी के दौर में सफाई व्यस्था का मशीनीकरण किया जाना न सिर्फ एक आधुनिक वैज्ञानिक सुधार है, बल्कि समाज के हासिये पर स्थित लोगो के मानव अधिकारों की रक्षा का एक अनिवार्य उपाय भी है |
आज विश्व भर में यह कार्य आधुनिक मशीनों द्वारा किया जा रहा है, लेकिन भारत में सीवर और गटर सफाई कर्मियों की जान जोखिम में डाली जाती है, तो यह राज्य की नैतिक और कानूनी विफलता की ओर स्पष्ट इशारा है |
इससे राजनैतिक इच्छा की भी स्पष्ट कमी झलकती है, जो कि मैला ढोने समस्या के समूल उन्मूलन के लिए आवश्यक है |
इस संकट का समाधान सिर्फ क़ानून बना देने और घोषणाओं से नहीं होगा, बल्कि संसद, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा सुझाये गए उपायों पर समयबद्ध कार्यवाही और जबाबदेही सुनिश्चित करने से ही सम्भव हो सकेगा |
हाथ से मैला ढोने की अमानवीय समस्या सिर्फ अतीत की विडम्बना नहीं है, बल्कि यह वर्तमान में भी अपना रूप बदल कर बरकरार है | इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए वेजवाडा विल्सन ने बहुत संघर्ष किया है |
आधुनिक समाज में आज यह एक मानव अधिकार संकट के रूप में व्याप्त है | जब तक यह कानूनों के पन्नों से असल जिंदगी में नहीं आच्छादित की जाती है तब तक इसके समाधान की उम्मीद करना बेमानी है |
इस बेरहम प्रथा का खात्मा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सभ्य समाज को भी इसमें अपनी गंभीर भूमिका निभानी होगी |
हम सभी को समाज में अपनी नैतिक और मानव अधिकार जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी क्यों कि मानव अधिकार चुप रहने से नहीं बचते हैं |
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क़ानून बना देने से कभी समस्या हल नहीं होती जब-तक कि शासन प्रशासन उस कानून को पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से लागू करने के लिए वचनबद्ध न हो। घोषणाओं से बदलाव नहीं होते बदलाव होते हैं देश के शासन प्रशासन और जन भागीदारी से ।
जवाब देंहटाएंदेश में बहुत से आयोग हैं लेकिन एकाद आयोग ही अपने निर्देशों का पालन करा पाने में सक्षम होता है।
देश की सामाजिक व्यवस्था ने एक बहुत बड़े वर्ग को बहुत नहीं धकेल रखा है। जो देश की तरक्की में अपना अमूल्य योगदान दे सकता है।