UGC 2026 Regulations: उच्च शिक्षा सुधार का नया युग क्यों?
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| Source: NHRC Website |
10 दिसम्बर 2025 को आज सम्पूर्ण विश्व में मानव अधिकार दिवस बहुत धूमधाम से मनाया गया है| मानव अधिकार दिवस सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि हर दिन और हर समय व्यक्ति के जीवन में रोजमर्रा के जरूरतों से जुड़ा हुया महोत्सव है |
मानव अधिकार दिवस विश्व भर के लोगों और सरकारों को यह अवसर देता है कि मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के बाद से लेकर अब तक क्या हम मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप दुनिया बना पाएं हैं कि नहीं ? भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक देश के लिए यह प्रश्न और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है |
भारत ने देश में मानव अधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया है | राज्यों में राज्य मानव अधिकार आयोगों का गठन किया है तथा में मानव अधिकार के मुकदद्मों की सुनवाई के लिए हर जिले में मानव अधिकार अदालतों की स्थापना की गई है |
सैद्धांतिक रूप से मानव अधिकार एक जटिल विषय है, लेकिन मानव अधिकारों को जन -जन तक पहुंचाने के लिए 10 दिसम्बर 2025 की थीम को आदमी की जरूरतों से जोड़ा गया है |
इस बार विश्व मानव अधिकार की थीम "मानव अधिकार : हमारी रोजमर्रा की जरूरतें" रखा गया है| आज के उथलपुथल वाले दौर में सुख, शांति, समानता और स्वंत्रता के साथ जीवन बिताना आसान काम नहीं है | इसी को आसान बनाने के लिए इस वर्ष की थीम में रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ा गया है |
आखिर रोजमर्रा की जरूरतों से मानव अधिकार जैसे गंभीर विषय का क्या लेना देना है, बस यहीं समझने की जरूरत है कि रोजमर्रा की जरूरते मानव अधिकारों को कैसे प्रभावित करती है |
मानव अधिकार तथा रोजमर्रा की जरूरतें दरअसल अलग -अलग न हो कर एक दुसरे के पूरक हैं |उदाहरण के तौर पर रोटी, कपड़ा, आवास, स्वच्छ वातावरण, स्वच्छ पीने योग्य पानी, बिना किसी भेदभाव के स्वतन्त्रता, स्वैक्षिक लिंग निर्धारण का हक, बोलने और अपनी पसंद का खाना खाने की स्वंत्रता, आदि अनेक ऐसी रोजमर्रा की आवश्यकताएं हैं, जिनके बिना व्यक्ति का चहुमुखी विकास होना संभव नहीं है |
दरअसल इस वर्ष की थीम के माध्यम से मानव अधिकारों की कठिन व्याख्या को अत्यधिक सरल भाषा में अत्यधिक आम जरूरतों से जोड़ने का प्रयास किया गया है |
यह प्रयास निश्चित रूप से मानव अधिकारों में आम आदमी की दिलचस्पी पैदा करने के साथ -साथ मानव अधिकारों को शिक्षा का जटिल विषय से बाहर लाकर आम आदमी तक उनके मानव अधिकारों की जानकारी पहुंचाने का एक अभिनव प्रयास है |
आपने देखा होगा कि दिल्ली में पटाखों तथा आसपास के राज्यों में खेतों में पराली जलाने के कारण विगत कई वर्षों से वायु प्रदुषण का स्तर बढ़ जाता है, जिसके चलते यह मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में तथा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल में पहुंचा |
जिसके बाद आम आदमी की रोजमर्रा के जरूरत अर्थात शुद्ध हवा के लिए न्यायालय ने सरकार को दिशा निर्देश दिए |
आम आदमी के लिए शुद्ध हवा और वातावरण की कमी और प्रदुषण के बढ़ते स्तर के कारण सांस सम्बन्धी रोगियों की संख्या में इजाफा देखा गया |
प्रदूषित वातावरण के कारण आम आदमी के जीवन के अधिकार का उलंघन होता है | स्वच्छ वातावरण और शुद्ध हवा का अभाव व्यक्ति के स्वास्थ्य के मानव अधिकार का उलंघन करता है |
पानी जैसी रोजमर्रा की जरूरत के लिए भी लोगो को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा | अधिकाँश लोग अवगत होंगे कि शहर से निकलने वाला सीवेज का पानी बिना किसी सफाई प्रक्रिया के गंगा में छोड़ा जाता था |
न्यायालय ने इस सम्बन्ध में दिशानिर्देश दिए | जिसके परिणाम स्वरुप सरकार द्वारा गंगा की सफाई के लिए नमामि गंगे जैसे प्रोजेक्ट चलाये गए | पीने लायक पानी की उपलब्धता एक मानव अधिकार है | भारतीय न्यायलयों ने इसे जीवन के अधिकार के तहत समाहित किया गया है |
आज सम्पूर्ण दुनिया एक छोटे से गांव में तब्दील हो गई है | विश्व के एक कोने का व्यक्ति दूसरे कोने में काम या किसी अन्य सिलसिले में पहुंच रहा है | ऐसी स्थति में अंतराष्टीय मानव अधिकार दो प्रौढ़ व्यक्तियों को विवाह का अधिकार देता है |
ऐसी स्थति में उनका विवाह दो विभिन्न संस्कृतियों और रीतिरिवाजों के टकराव का मुद्दा बन सकता है, लेकिन मानव अधिकार बिना किसी बाधा के उन्हें विवाह का अधिकार देते हैं |
मानव अधिकार हमारी रोजमर्रा की आवश्यकताएं अभियान से सयुंक्त राष्ट्र संघ लोगो को मानव अधिकार से फिर से जोड़ना चाहता है |
सयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि लोग ऐसे तरीकों पर अक्सर ध्यान नहीं देते है जो उनके मानव अधिकारों को प्रभावित करते हैं |
मानव अधिकारों को लोग अधिक महत्व नहीं देते हैं | जबकि वे अत्यधिक आवश्यक चीजें है जिन पर वह निर्भर रहते हैं | मानवाधिकार सिद्धांतों और रोजमर्रा के अनुभवों के बीच की खाई है |
यह अभियान उसे पाटने का प्रयास है | इस अभियान का लक्ष्य आम आदमी के बीच जागरूकता पैदा करना, आत्मविश्वास जगाना है।
भारतीय सन्दर्भ में आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े हुए अनेक विषय हैं | जिनके सम्बन्ध में जागरूक लोगों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और उन्हें अपने मानव अधिकार प्राप्त करने में सफलता मिली |
इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की यह पहल उनकी रोजमर्रा की जरूरतों सम्बन्धी मानव अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने में सफल होगी |
जिसके परिणाम स्वरुप आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों सम्बन्धी मानव अधिकारों के लिए आवाज उठा सकेगा, जबकि अभी जानकारी के अभाव में वे रोजमर्रा की जरूरतों सम्बंधित मानव अधिकारों पर बिलकुल ध्यान ही नहीं देते हैं |
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