UGC Fake Universities List 2026: भारत के फर्जी विश्वविद्यालयों की पूरी सूची
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नए भारत में पर्यावरण प्रदूषण सिर्फ पारिस्थितिकी का विषय नहीं रहा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, स्वच्छ जीवन और जीवन के अधिकार से जुड़ा मानव अधिकार का मूल प्रश्न बन चुका है |
भारत में पर्यावरण संरक्षण और उससे जुड़े मानव अधिकारों के संरक्षण के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के किये वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)की स्थापना की गई थी |
यह एक ऐसा विशेष न्यायाधिकरण है जिसने लगभग पिछले 15 वर्षों में पर्यावरण न्याय की दिशा में बहुत तेजी और प्रभावी तरीके से काम किया है |
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) न सिर्फ पर्यावर्णीय हानि को रोकता है, बल्कि उससे जुड़े मानव अधिकारों के उलंघन से भी बचाता है |
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में, बल्कि मानव अधिकार संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | जिसे हम कई उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे |
भारत का माननीय सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय के प्रति अत्यधिक सचेत और संवेदनशील है | सुप्रीम कोर्ट ने विधि व्यवस्था M K Ranjitsinh & Ors Versus Union of India & Ors, 2024 INSC 280 में कई कई विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए कहा है कि पर्यावरण सम्बंधित अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार कानूनों को न्यायालय तथा वकीलों को न्याय के दौरान भूलना नहीं चाहिए |
विधि व्यवस्था परिधान निर्यात संवर्धन परिषद बनाम ए.के. चोपड़ा, AIR 1999 SC 625 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे मामलों का हवाला दिया जो इस प्रस्ताव के लिए मिसाल कायम करते हैं कि इस न्यायालय को उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों को लागू करना चाहिए जिनमें भारत पक्षकार है:
“ सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इस बात पर ज़ोर दिया है कि संवैधानिक आवश्यकताओं पर चर्चा करते समय, न्यायालय और वकील को अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और दस्तावेजों में निहित मूल सिद्धांत को कभी नहीं भूलना चाहिए और जहाँ तक संभव हो, उन अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेजों में निहित सिद्धांतों को लागू करना चाहिए।
न्यायालयों का दायित्व है कि वे घरेलू कानूनों की व्याख्या के लिए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और मानदंडों को उचित ध्यान दें, खासकर तब जब उनके बीच कोई असंगतता न हो और घरेलू कानून में कोई शून्यता हो।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 253 में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय संसद को किसी अन्तराष्ट्र्रीय मानव अधिकार संधि, समझौते या अभिसमय को क्रियान्वित करने के लिए भारत के सम्पूर्ण क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति है।
इन्ही सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संसद ने विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों को नियंत्रित करने के लिए कई क़ानून बनाये हैं |
ये क़ानून हैं :
(1).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974;
(2).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977;
(3).वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980;
(4).वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981;
(5).पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986;
(6).सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम,1991;
(7 ) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम ,2010;
(8).जैविक विविधता अधिनियम, 2002. |
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला M.C. Mehta v. Union of India, (2000) 2 SCC 679 प्रदूषण के ताजमहल पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर था | यह मामला ताज महल के आस पास चलने वाले ईंट भट्टे और कोयले से प्रदुषण फैलाने वाली फैक्ट्रीयों से जुड़ा था | सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रासायनिक प्रदूषण ताजमहल को नुकसान पहुंचा रहा हैं।
ताजमहल के आसपास के इलाके को ताज ट्रेपेजियम जोन घोषित करते हुए इस जोन में कोयले से संचालित सभी उधोगो को कोयले के स्थान पर प्रोपेन जैसे स्वच्छ ईंधन का उपयोग करने या फिर स्थानांतरित होने का निर्देश दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था में स्थापित किया कि स्वच्छ पर्यावरण संविधान के अनुछेद 21 के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है |
इसमें यह भी स्थापित किया गया कि प्रदुषण फैलाने वाले उधोगों पर Polluters Pays Principles के सिद्धांत के अनुरूप जुर्माना लगाया जाना चाहिए |
इस निर्णय के बाद के बाद दुनिया को पता लगा कि यह सिर्फ प्रदुषण का मामला नहीं है बल्कि स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण मुद्दा है |
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| Source:Dinh Khoi Nguyen from Pixabay |
Almitra H. Patel v. Union of India(NGT OA No. 199 /2014) का केस पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट में बतौर जनहित याचिका के रूप में दाखिल हुया था |
बाद में यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में स्थानांतरित कर दिया गया | यह मामला शुष्क अपशिष्ट (ठोस कचरा) प्रबंधन से जुड़ा था | इस मुकदद्मे के दौरान शुष्क अपशिष्ट के अपर्याप्त प्रबंधन से होने वाली जन स्वास्थ्य की हानी के बारे में जानकारी हुई |
इस केस में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शुष्क अपशिष्ट प्रबंधन के आदेश किये साथ में यह भी निर्देशित किया कि ठोस कूड़ा प्रबंधन नियम, 2016 को सम्पूर्ण देश में लागू किया जाए |
इस प्रकार NGT ने इस मुद्दे को एक सफाई की समस्या नहीं रहने दिया, बल्कि इसे मानवीय जीवन और स्वास्थ्य के लिए संकट बताकर मानव अधिकार का गंभीर मुद्दा बना दया | आज यह मुद्दा मानव अधिकार का महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जाता है |
विधि व्यवस्था Arjun Gopal v. Union of India, (2017) 1 SCC 412 में अर्जुन गोपाल और अन्य ने रिट याचिका (सिविल) संख्या 728/2015 दायर की थी |
इस याचिका में याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आतिशबाजी (पटाखों सहित) के इस्तेमाल पर रोक लगाने, हानिकारक फसलों को जलाने से रोकने तथा मलबा फेंकने और पर्यावरण शुद्धता की दिशा में अन्य कदम उठाने की मांग की गई थी ।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पिछले वर्ष दिवाली के दौरान पटाखों के व्यापक उपयोग से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु गुणवत्ता मानक बिगड़ गए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सर्दियों की शुरुआत से ही इस क्षेत्र में वायु गुणवत्ता बिगड़ जाती है |
यह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है तथा यहाँ वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से 29 गुना अधिक हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कहा कि वायु प्रदूषण के प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखते हुए तथा स्वच्छ हवा में सांस लेने के मानव अधिकार और स्वास्थ्य के मानव अधिकार को भी ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार और अन्य प्राधिकारियों को यह विचार करना चाहिए कि लोगों को व्यक्तिगत रूप से आतिशबाजी चलाने के लिए हतोत्साहित किया जाए तथा उसके बजाय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से आतिशबाजी के प्रदर्शन को प्रोत्साहित किये जाने पर चिंतन किया जाना चाहिए |
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| Source:Milan Kullu from Pixabay |
विधि व्यवस्था एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ एवं अन्य, (1988) 2 SCR 530 में कानपुर, उत्तर प्रदेश में गंगा जल के प्रदूषण के नियंत्रण, रोकथाम और उसकी समाप्ति के संबंध में नगर निकाय की जिम्मेदारी के मुद्दे को उठाया गया था।
जिसके निर्णय में जल और वायु प्रदूषण के गंभीर परिणामों और प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, जिसे संविधान के तहत मौलिक कर्तव्यों में से एक माना जाता है |
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए के खंड (छ) के अनुसार केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह पूरे भारत के सभी शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दे कि वे पहली दस कक्षाओं में सप्ताह में कम से कम एक घंटा वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण के संरक्षण और सुधार से संबंधित पाठ पढ़ाएँ।
इस निर्णय से नदी में शवों और अधजले शवों को गंगा नदी में फेंकने की प्रथा पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया है |
इस प्रकार आप देखेंगे कि NGT की स्थापना के बाद पर्यावरण प्रदुषण से सम्बंधित अनेक मामलों की सुनवाई की गई है | जिनमे प्रदुषण को रोकने के लिए विभिन राज्य सरकारों तथा संस्थाओं को अनेक दिशा निर्देश आवश्यकता अनुसार जारी किये गए |
अनेक मामलों में NGT द्वारा दिए गए निर्णय के बेहतरीन परिणाम देखने को मिले हैं | इनमे आगरा का ताज ट्रेपेजियम जोन का मामला अत्यधिक महत्वपूर्ण है |
आगरा के आसपास सभी प्रदूषणकारी खतरनाक उधोग बंद हो गए या स्थानांतरित हो गए | इसके अतिरिक्त ताज ट्रेपेजियम जोन में चलने वाले सभी ईंट के भट्टे, जो कोयले पर आधारित थे, बंद करा दिए गए |
निसंदेह अनेक मामलों में NGT के फैसलों का प्रभाव प्रदुषण नियंत्रण के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है | प्रदुषण नियंत्रण सतत विकास के लिए एक आवश्यक शर्त है |
पर्यावरण संरक्षण और मानव अधिकार एक दूसरे के पूरक हैं | पर्यावरण संरक्षण से अनेक मानव अधिकारों का स्वतः ही संरक्षण हो जाता है क्यों कि कई मानव अधिकार एक दूसरे पर अंतर्निर्भर होते हैं |
इसे देखते हुए स्पष्ट है कि NGT न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, बल्कि आम और खास जन सभी के मानव अधिकारों का भी बिना किसी भेदभाव के संरक्षण कर रहा है |
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भारत में प्रदुषण नियंत्रण के लिए विशेष न्यायिक ट्रिब्यूनल है | नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भारत को प्रदूषण की गिरफ्त से बाहर निकालने में बहुत योगदान दिया है |
यही नहीं ट्रिब्यूनल ने प्रदुषण की दिशा को पर्यावरण संरक्षण की ओर ले जाने का काम किया है | ट्रिब्यूनल की यात्रा प्रदुषण को प्रदुषण मुक्त वातावरण में बदलने और उनसे जुड़े मानव अधिकारों की रक्षा की रही है |
NGT की मानव अधिकारों की यात्रा सिर्फ कागजों पर मानव अधिकारों से संबधित नहीं रही है, बल्कि यह यात्रा मानव अधिकारों को धरातल पर आभास कराने की रही है | जिसमे शामिल है सवास्थ्य, सुरक्षा और मानव अधिकार केंद्रित एक नए भारत की मजबूत और सुरक्षित बुनियाद |
👉प्रश्न 1 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) क्या है?
उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट के अनुसार, 2010 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना हुई थी | यह एक विशिष्ट न्यायिक निकाय है |यह देश में पर्यावरण प्रदुषण और संरक्षण के मामलो में निर्णय के लिए विशेषज्ञता विशेषज्ञता रखता है।अधिकाँश पर्यावरण से जुड़े मामले बहुविषयक होते हैं | जिनका एक ही मंच से निराकरण किया जाता है | भारत के अंतराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों के अनुसरण में राष्ट्रीय पर्यावरण क़ानून के विकास और उनका प्रभावी अनुपालन के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग की सिफारिशों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी |
👉प्रश्न 2 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का कार्य क्या है ?
उत्तर : ट्रिब्यूनल का कार्य पर्यावरण प्रदुषण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विषयों ,जिसमे वनों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण भी शामिल हैं, से जुड़े मुकदद्मों को देखना और उनमे निर्णय देना है |
👉प्रश्न 3 :नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में किस प्रकार के मुकदद्मों की सुनवाई की जाती है |
उत्तर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट,2010 की अनुसूची 1 में दिए गए विषयों के सम्बन्ध में पर्यावरण हानि के लिए राहत तथा मुआवजे की मांग करने वाला कोई भी व्यक्ति नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपनी शिकायत /याचिका को प्रस्तुत कर सकता है | अनुसूची 1 में दिए गए विषय निम्नवत हैं :
(1).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974;
(2).जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977;
(3).वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980;
(4).वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981;
(5).पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986;
(6).सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991;
(7).जैविक विविधता अधिनियम, 2002.
👉प्रश्न 4 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश बाध्यकारी हैं ?
उत्तर : हाँ , नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के द्वारा दिए गए आदेश बाध्यकारी होते हैं |
👉प्रश्न 5 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को पर्यावरण प्रदुषण से प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा और छतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने काअधिकार है |
उत्तर : हाँ , इसे प्रभावित व्यक्तियों को मुआवज़ा और क्षतिपूर्ति के रूप में राहत प्रदान करने का अधिकार प्राप्त है।
👉प्रश्न 6 : क्या मुझे न्यायाधिकरण तक पहुंचने के लिए किसी वकील की मदद लेनी होगी?
उत्तर : नहीं, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष किसी मामले को ले जाने के लिए किसी वकील की नियुक्ति आवश्यक नहीं है। पीड़ित पक्ष अपनी शिकायत निश्चित प्रारूप पर ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है |
👉प्रश्न 7 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय बाध्यकारी हैं?
उत्तर: हाँ, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय बाध्यकारी प्रभाव रखते हैं, क्योंकि इसमें निहित शक्तियाँ सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन दीवानी प्रकृति की हैं |
👉प्रश्न 8 : क्या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्णय अंतिम होते हैं?
उत्तर : नहीं, ट्रिब्यूनल को अपने निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार है। ट्रिब्यूनल के निर्णय के विरुद्ध विपक्षी पक्ष नब्बे दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती पेश कर सकता है।
👉प्रश्न 9 : क्या भारत में पराली जलाना कानूनी है?
उत्तर : नहीं, भारत में पराली जलाना कानूनी नहीं है | पराली जलाने पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जुर्माना दो गुना कर दिया गया है |
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