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नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026: भारत में मानव अधिकार चुनौतियाँ

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  Cradit:Advt. of U P Govt भूमिका  भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जहाँ सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु दर बहुत अधिक है | हर दिन सैकड़ों परिवार अपने लोगों को खो देते हैं |  यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक चिंता है | इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026 की शुरूआत की, ताकि सड़क दुर्घटनाओं को रोका जा सके |  इसके अलावा इसका उद्देश्य आम नागरिकों में जिम्मेदार यातायात व्यवहार को विकसित करना है, यह व्यवहार ही सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का सर्वश्रेष्ट्र उपाय है |  सरकार द्वारा चलाया जाने वाला यह अभियान आम जनता तक सिर्फ यातायात नियमों की जानकारी प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुरक्षित सड़को और सुरक्षित यात्रा से जुड़ा मानव अधिकार है, जो प्रत्यक्ष रूप संविधान प्रद्दत जीवन के अधिकार के अधीन आता है | यह राज्य की जिम्मेदारी है। यह भी पढ़ें  : प्रेम के नाम पर पॉक्सो से मुक्ति: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सड़क दुर्घटनाओं का वैश्विक भार  विश्व भर में हर साल रोड ट्रैफिक दुर्घटनाओं की वजह से लगभग 11.9 ल...

SIR ड्यूटी में BLO मौतें: क्या चुनावी सुधार बन रहा है मानव अधिकार संकट?

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Source:Google Gemini प्रस्तावना भविष्य के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए भारत में चुनाव आयोग द्वारा देशभर में SIR (Special Intensive Revision) कार्यक्रम का अभियान तेजी से चलाया जा रहा है |  इस अभियान का उद्देश्य पुरानी मतदाता सूचियों को अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है |  इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए BLOs की ड्यूटी लगाईं गई है |  SIR के दौरान इन BLOs को मतदाता सूची अद्यतन के लिए लोगों के घर -घर जाकर मतदाताओं से सम्बंधित सूचनाएं का सत्यापन, उनके फॉर्म भरना, मृतकों के नामो को मतदाता सूची से हटाना, नामो को जोड़ना, डिजिटल मोड में एंट्री आदि के लिए लगाया गया है |  लेकिन इस 2025 के SIR अभियान के दौरान  कई भारतीय राज्यों से लगातार BLOs की मौत या आत्महत्यायों की ख़बरों ने राजनैतिक गलियारों तथा समाज  में  गंभीर चिंता की लहार पैदा कर दी है |  इन घटनाओं ने चुनावी सुधार पर एक प्रश्न खड़ा कर दिया है | क्या वास्तव में यह अभियान लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है या इसमें लगे BLOs के मानव अधिकारों पर ही कुठाराघात कर रहा है ? आकस्मिक रूप से सामने आई यह समस्या एक गं...

NGT और पर्यावरण न्याय: भारत में मानवाधिकार सुरक्षा का नया मॉडल

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Source: Chat GPT परिचय :  नए भारत में पर्यावरण प्रदूषण सिर्फ पारिस्थितिकी का विषय नहीं रहा है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, स्वच्छ जीवन और जीवन के अधिकार से जुड़ा मानव अधिकार का मूल प्रश्न बन चुका है |  भारत में पर्यावरण संरक्षण और उससे जुड़े मानव अधिकारों के संरक्षण के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने के किये वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT)की स्थापना की गई थी |  यह एक ऐसा विशेष न्यायाधिकरण है जिसने लगभग पिछले 15 वर्षों में पर्यावरण न्याय की दिशा में  बहुत तेजी और प्रभावी तरीके से काम किया है |  राष्ट्रीय हरित अधिकरण  (NGT) न सिर्फ पर्यावर्णीय हानि को रोकता है, बल्कि उससे जुड़े मानव अधिकारों के उलंघन से भी बचाता है |  राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने भारत में न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में, बल्कि मानव अधिकार संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है | जिसे हम कई उदाहरणों के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे |   सुप्रीम कोर्ट, पर्यावरण न्याय और मानव अधिकार भारत का माननीय सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण न्याय के प्रति अत्यधिक सचेत और संवेदनशील है | सुप्रीम कोर्...

भारत में ट्रांसजेंडर्स की जीवन यात्रा : पहचान के संकट से मानव अधिकारों तक !

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Source: Instagram @weareyuvaa भूमिका   भारत विविधताओं से संपन्न देश है बाबजूद इसके भारतीय संस्कृति में वसुधैव कुटुंबकम की प्राचीन अवधारणा का प्रभुत्व आज भी दिखाई देता है | यहाँ हर धर्म, पंथ, मूलवंश, जाति, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति  के लोग मिलजुल कर एक साथ रहते हैं |  लेकिन ऐतिहासिक रूप से देखा जाय तो ट्रांसजेंडर समुदाय को इस विविधता से भरे भारतीय समाज में वह पहचान नहीं मिली है जिसके वे हक़दार रहे हैं | सदियों से उन्हें उनकी मूल पहचान और गरिमा से वंचित रखा गया है | ट्रांसजेंडर समुदाय को समाज में हिजड़ा ,किन्नर आदि के नामो से भी जाना जाता है |  उन्हें माननीय कोर्ट के के नालसा निर्णय के बाद तीसरे लिंग के रूप में विधिक मान्यता मिली है | यह समुदाय सदियों से गंभीर भेदभाव, उपेक्षा और अनेक रूपों में हिंसा का सामना करता आया है|  समाज में उनके साथ भेद भाव के चलते स्वास्थ्य, शिक्षा ,रोजगार और गरिमामई जीवन के अधिकार से वंचित रहना पड़ा है | यह सब उनके द्वारा मानव अधिकार की मूल भावना के विरुद्ध झेला गया है | परन्तु भारत में पिछले एक दशक से ट्रांसजेंडर्स की स्थति में बदलाव आये हैं ...

मानवाधिकार शिक्षा का नया अध्याय: बच्चों को सिखाई जाएगी लैंगिक सुरक्षा की समझ

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Source: Chat GPT परिचय भारत में एक वरिष्ठ अधिवक्ता  आबाद हर्षद पोंडा  द्वारा हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट में  एक जनहित याचिका दायर की गई है | इस जनहित याचिका ने शिक्षा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है | इस याचिका Aabad Harshad Ponda v. Union of India , W.P. (Crl.) No. 382/2024 का उद्देश्य, "भारत में महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा के बारे में जागरूकता पैदा करने तथा इस संबंध में, शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्देश प्राप्त करना रहा है |   सुप्रीम कोर्ट ने इस PIL को स्वीकार करते हुए इस पर संज्ञान लिया है | माननीय कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि देशभर में शैक्षणिक संस्थानों में महिला सुरक्षा और यौन अपराधों से संबंधित कौन-कौन से शिक्षण मॉड्यूल पहले से चल रहे हैं। मामले का मूल आधार  विगत कुछ वर्षों में देखा गया है कि भारत में यौन अपराधों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं | इसका एक कारण नाबालिगों में कानून की समझ का कम होना है | इस कारण से समाज में यह चिंता का विषय बना हुआ है |  यह मानना है याचिकाकर्ता का |  याचिकाकर...

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