Children in Conflict with Law: JJ Act 2015 में बच्चों के अधिकार और मानवाधिकार | 2026

Children in Conflict with Law JJ Act 2015 में बच्चों के अधिकार और मानवाधिकार 2026
प्रस्तावना 

पुलिस द्वारा अपनी चालानी रिपोर्ट में अक्सर विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों की अधिक उम्र दर्शाने के कारण उन्हें प्रौढ़ जेलों में बंद कर दिया जाता है जिसके कारण उन्हें अपने मानव अधिकारों से वंचित होना पड़ता है | 

जबकि बालकों के  लिए विशेष रूप से  बने किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम,2015 में बालकों के मानव अधिकारों के संवर्धन एवम संरक्षण के लिए कई विधिक सिद्धांतों की व्यवस्था की गयी है | 

लेकिन उन सिद्धांतों का किशोर न्याय बोर्ड ,बाल कल्याण समिति तथा अन्य अभिकरणों द्वारा समुचित रूप से अनुपालन  और अनुसरण नहीं हो रहा है | जिसके कारण आये दिन विधि का उलंघन करने वाले बालकों के मानव अधिकारों का उल्लंघन आम बात हो गयी है | 

समाज और आपराधिक न्याय व्यवस्था के विभिन्न अंगों द्वारा उक्त सिद्धांतों का व्यवहार  में अनुसरण करके विधि का उलंघन करने वाले बालकों के जाने-अनजाने में होने वाले मानव अधिकार उल्लंघन को आसानी से रोका जा सकता है |

मुख्य शब्द : मानव अधिकार , किशोर , विधि का उल्लंघन करने वाले बालक, भारतीय संविधान , निजता का अधिकार ,पोक्सो एक्ट 2012 ,जे जे एक्ट 2015 |  

प्रस्तावना

           आज के समाज में ,बालकों के मानव अधिकारों का उलंघन एक ज्वलंत  सामाजिक और मानवाधिकार  मुद्दा है | जिस पर हमें संजीदगी और गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है | 

किशोरों द्वारा किये गए अपराधों के सम्बन्ध में किशोरों के साथ प्रौढ़ अपराधियों  के जैसा व्यवहार अंतराष्ट्रीय कानूनों द्वारा प्रतिषिद्ध किया गया  है । 

इस सन्दर्भ में भारत में पहला क़ानून 1986 में आया, जिसे वर्ष 2000 में संशोधित किया गया तथा उसके बाद किशोरों के बृहद हित को ध्यान रखते हुए एक बार फिर वर्ष 2015 में वर्ष 2000 वाले क़ानून को समाप्त कर नए क़ानून को लाया गया जो कि किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 कहलाया | 

इस अधिनियम के माध्यम से, बालकों के संरक्षण और मानव अधिकारों की रक्षा में समाज से लेकर आपराधिक न्याय वयवस्था तक  सभी स्तरों पर सहयोग की आवश्य्कता है |

यह लेख उन असहाय Children in Conflict with Law के मानव अधिकारों की अवधारणा को समझने और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए  सामजिक, विधिक और  मानव अधिकार सन्दर्भ में जागरूकता फैलाने का एक प्रयास है |

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JJ Act 2015 अधिनियम का उद्देश्य क्या है ?

उक्त अधिनियम का उद्देश्य है कि अधिनियम के अधीन भारतीय संविधान के अनुछेद 15 के खंड (3), अनुच्छेद 39 के खंड (ड ) और खंड (च ),अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 47 के उपबंधों के अधीन यह सुनिश्चित करने के लिए कि बालकों की सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जाए और उनके मूलभूत मानव अधिकारों की  पूर्णतया संरक्षण किया जाए |,शक्तियां प्रदान की गई है, और कर्तव्य अधिरोपित किये हैं |

यह अधिनियम  स्पष्ट करता है कि तत्समय किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट  किसी बात के होते हुए हुए भी ,इस अधिनियम के उपबंध के तहत देख रेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों से सम्बन्धित सभी मामलों तथा विधि का उलंघन करने वाले बालकों से सम्बंधित सभी मामलों पर लागू होंगे जिसके अंतर्गत

(1) Children in Conflict with Law की गिरफ्तारी,निरोध,अभियोजन शास्ति और,पुनर्वास और समाज में पुनः मिलाना |

(२) देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के पुनर्वास ,दत्तक ग्रहण ,समाज में पुनः मिलाने और वापसी की प्रक्रियाएं और विनिश्चिय अथवा आदेश भी शामिल हैं |

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Children in Conflict with Law क्या है ?

किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम, 2015 में  किसी भी क़ानून का उल्लंघन करने वाले बालक को, जिसे Children in Conflict with Law के रूप में परिभाषित किया गया है|व्यक्ति ने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो तो वह बालक की परिभाषा में आता है |इस अधिनियम में को उनके मानव अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई मानक प्रावधान किये गए हैं | 

अधिनियम के अनुसार बालकों को दंड के प्रावधान  प्रौढ़ अपराधियों के मुकाबले अत्यधिक लचीले बनाये गए हैं | बालकों के अधिकार भी मानव अधिकार की श्रेणी में आते है |

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मानव अधिकार क्या हैं ?

मानव अधिकार सामान्य तौर पर वे अधिकार है जो हर व्यक्ति को उसके मनुष्य होने नाते स्वतः प्राप्त होते है | ये अविभाज्य ,अन्तर्सम्बन्धित और अन्तर्निर्भर होते है | 

साधारण तौर पर मानव अधिकारों को आर्थिक,सामजिक,सांस्कृतिक,नागरिक और राजनैतिक मानव अधिकारों की श्रेणी में रखा गया है | 

इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत और सामूहिक मानव अधिकार की श्रेणी में विभक्त किया गया है | बालकों के मानव अधिकार सामूहिक मानव अधिकारों की श्रेणी में आते हैं | 

सयुंक्त राष्ट्र  की परिभाषा के अनुसार मानव अधिकार जाति ,लिंग ,राष्ट्रीयता ,भाषा ,धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किये बिना सभी को प्राप्त हैं |

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मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम,1993 के  अनुसार"मानव अधिकार " की परिभाषा क्या है ?

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम,१९९३ की धरा २ के  अनुसार "मानव अधिकार " का तात्पर्य  संविधान के अंतर्गत गारंटीकृत  अथवा अंतर्राष्ट्रिय प्रसंविदाओं में सम्मिलित तथा भारत के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय जीवन,स्वंत्रता,समानता तथा व्यक्ति की गरिमा से सम्बंधित अधिकार है |

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Children in Conflict with Law और मानव अधिकार

बाल अधिकारों पर कन्वेंशन 1989 मानता  है कि किशोरों के भी मानव अधिकार हैं , और  18 वर्ष से छोटी उम्र के व्यक्तियों को यह  सुनिश्चित करने के लिए विशेष  सुरक्षा की आवश्यकता है कि उनका पूर्ण विकास ,उनके अस्तित्व और उनके सर्वोत्तम हितों का सम्मान किया जाए |

यूनीवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स  1948 में बिना किसी विभेद के सभी को मानव होने के नाते मानव अधिकार प्राप्त हैं | 

लेकिन उक्त घोषणा पत्र में किशोरों के विशेष सन्दर्भ में कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं था | लेकिन समय के साथ साथ Children in Conflict with Law विधि का उलंघन करने वाले बालकों  और पीड़ित किशोरों  के मानव अधिकारों के संवर्धन अवं संरक्षण के लिए विशेष कानूनों की आवश्यकता महसूस की गयी जिसकी भरपाई के लिए  बच्चों के अधिकार पर कन्वेंशन 1992 को स्वीकृत और अंगीकृत किया गया |  

भारत सरकार ने सयुक्त राष्ट्र की साधारण  सभा द्वारा अंगीकृत बालकों के अधिकारों से सम्बंधित अभिसमय को,जिसमे ऐसे मानक विहित किये गए हैं  जिसका बालक के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करने के लिए  सभी राज्य पक्षकारों द्वारा पालन किया जाना है ,का दिनांक 11 दिसम्बर 2092 को अंगीकरण किया गया |

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Children in Conflict with Law द्वारा किये गए अपराधों का वर्गीकरण

Children in Conflict with Law द्वारा किये गए अपराधों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है :

प्रथम  श्रेणी में "छोटे अपराध"  जिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय  प्रबृत अन्य विधि के अधीन अधिकतम दंड  3 मॉस के कारावास का है |

द्वितीय श्रेणी में "घोर अपराध"  जिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय  प्रबृत  अन्य विधि के अधीन -

(क)तीन वर्ष से अधिक और 7 वर्ष से अनधिक की अवधि के न्यूनतम कारावास का उपबंध है |

(ख) 7वर्ष से अधिक के अधिकतम कारावास का उपबंध है किन्तु कोई न्यूनतम कारावास या 7 वर्ष से कम के न्यूनतम कारावास का उपबंध नहीं है |

तृतीय श्रेणी में "जघन्य अपराध" रखे गएँ हैं |जिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय प्रबृत  अन्य विधि के अधीन न्यूनतम कारावास 7 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का है |

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Children in Conflict with Law के सम्बन्ध में प्रसाशन द्वारा अनुसरित किये जाने वाले साधारण सिद्धांत

 किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)अधिनियम, 2015 में Children in Conflict with Law के मानव अधिकारों को प्रत्यछ रूप में उद्द्घृत नहीं किया गया है लेकिन उसके कई प्रावधान अप्रत्यछ रूप में  Children in Conflict with Law के मानव अधिकारों की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं तथा उनके मानव अधिकारों का संवर्धन एवम संरक्षण को  बढ़ावा देते हैं |

बालकों के ये मानव अधिकार किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)अधिनियम, 2015 के प्रसाशन में अनुसरित किये जाने वाले साधारण सिद्धांतों के रूप में इंगित किये गए हैं | ये मूलभूत सिद्धांत केंद्रीय सरकारों, बोर्ड ,समिति या अन्य अभिकरण द्वारा अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वयन करते समय मार्गदर्शन के रूप में कार्य करते है | 

ये मूलभूत सिद्धांत ही दरअसल Children in Conflict with Law के मानव अधिकार है | ये बालक के मानव अधिकारों का संवर्धन और संरक्षण करते हैं | 

ये मूलभूत सिद्धांत निम्न प्रकार हैं :

1. निर्दोषिता की उपधारणा का अधिकार-किसी Children in Conflict with Law के 18 वर्ष की आयु पूर्ण न करने तक यह उपधारणा की जाएगी कि वह किसी असद्भावना पूर्वक या आपराधिक आशय का दोषी नहीं है |

2. गरिमा और योग्यता का अधिकार-सरकार ,किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति या अन्य अभिकरण के द्वारा सभी बालकों के साथ गरिमा और अधिकारों के साथ वर्ताब किया जाना चाहिए | 

3. विधिक कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार-प्रत्येक Children in Conflict with Law को सुने जाने का और उसके हितों को प्रभावित करने वाली सभी कार्यवाहियों में भाग लेनेका अधिकार प्राप्त है|

4. बालक के सर्वोत्तम  हित का सिद्धांत-बालक के सम्बन्ध में सभी विनिश्चय /आदेश मुख्यतया इस आधार पर किये जाएंगे कि वे बालक के सर्वोत्तम हित में हों | 

बालक के इस मानव अधिकार का का दारोमदार बालकों के सम्बन्ध में क़ानून का क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं पर है जिसमे सरकार,किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति  तथा अन्य अभिकरण आते हैं |

5.सुरक्षा का सिद्धांत- Children in Conflict with Law की सुरक्षा के हित में सभी उपाय किये जाने चाहिए| जो बालक को  उपहानी ,दुर्व्यवहार या बुरे  बर्ताव से बचाते हों |

6. गैर कलंकीय शब्दार्थों का सिद्धांत-किसी Children in Conflict with Law के सम्बन्ध में किये गए आदेश या विनिश्चय में प्रतिकूल या अभियोगात्मक शब्दों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए |  

7. अधिकारों का अधित्यजन न किये जाने का सिद्धांत-विधि के अनुसार Children in Conflict with Law के किसी अधिकार का किसी भी प्रकार से अधित्यजन (त्याग) अनुज्ञेय या विधिमान्य नहीं है |

चाहे उस अधिकार को त्यागने की इच्छा उस बालक द्वारा या बालक की और से कार्य करने वाले व्यक्ति  या किसी बोर्ड या समित द्वारा  क्यों न की गयी हो | 

किसी मूल अधिकार का प्रयोग न किया जाना अधित्यजन की कोटि में नहीं आता है |

8. समानता और विभेद न किये जाने का सिद्धांत-Children in Conflict with Law  के विरुद्ध किसी भी आधार पर ,जिसमे लिंग ,जाति ,नस्ल ,जन्म स्थान ,निसक्तता भी आती है ,किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा  और पहुंच ,अवसर  और बर्ताव में समानता हर बालक को दी जानी चाहिए |

9. एकान्तता और गोपनीयता के अधिकार का सिद्धांत- प्रत्येक Children in Conflict with Law को सभी साधनो द्वारा और सम्पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया और व्यवस्था में अपनी एकान्तता और गोपनीयता का संरक्षण करने का अधिकार प्राप्त है |

10. अंतिम उपाय के रूप में बालकों को संरक्षण गृह में रखने का सिद्धांत-किसीChildren in Conflict with Law को उसकी युक्तियुक्त जांच के बाद ही अंतिम अवलम्बन के उपाय के रूप में संथागत देखरेख में रखा जाना चाहिए |

11. नए सिरे से शुरूआत करने का सिद्धांत-किशोर न्याय पद्धति के अधीन किसी बालक के अपराध से सम्बंधित पिछले सभी अभिलेखों को विशेष परिस्थितियों के सिवाय समाप्त कर दिया जाना चाहिए अन्यथा की स्थिती में नहीं |

12. बालक और प्रौढ़ अभियुक्त की कार्यवाही का एक साथ न होने का सिद्धांत-किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 की धारा 23(1) के अनुसार दंड प्रक्रिया सहिंता ,1973 की धरा 223 में या तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी विधि का उलंघन करने वाले  किसी  बालक के साथ किसी ऐसे व्याक्ति  की जो बालक नहीं है, सयुंक्त कार्यवाही नहीं की जा सकती है | 

13. Children in Conflict with Law के विरुद्ध पारित न किया जा सकने वाला आदेश-किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम, 2015 की धारा 21 के तहत किसी Children in Conflict with Law को इस अधिनियम  के  उपबंधों अधीन या भातीय दंड संहिता 1860 या तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन ऐसे किसी अपराध के लिए छोड़े  जाने की संभावना के बिना मृत्यु या आजीवन कारावास का दंडादेश नहीं दिया जाएगा |

14. किसी अपराध के निष्कर्षों के आधार पर निर्हर्ताओ से मुक्ति का अधिकार-किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 की धारा 24(1) के अनुसार तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि में किसी अन्य बात के होते हुए भी ,कोई बालक ,जिसने कोई अपराध किया है तथा जिसके बारे में इस अधिनियम के अधीन कार्यवाही  की जा चुकी है | 

किसी ऐसी निर्हता (अयोग्यता )से ,यदि कोई हो ,ग्रस्त नहीं माना जाएगा ,जो ऐसी विधि के अधीन किसी अपराध की दोषसिद्धि से जुडी हो ;

इसी अधिनियम की धरा 24(2)के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड ,पुलिस को या बालक न्यायालय या अपनी स्वयं की रजिस्ट्री को यह निदेश देते हुए आदेश देगा कि ऐसी दोषसिद्धि के सुसंगत अभिलेख ,यथास्तिथि ,अपील की अवधि या ऐसी युक्तियुक्त अवधि,जो विहित की जाए ,समाप्त होने के पश्चात नष्ट कर दिए जायेगे | परुन्त जघन्य अपराध की दिशा में यह स्तिथि लागू नहीं होगी |

15. निजता का अधिकार-किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015की धारा 74(1) के  अंतर्गत बालक की  पहचान के प्रकटन का प्रतिषेद किया गया है जिसके अनुसार किसी जांच या अन्वेषण या  न्यायिक प्रक्रिया के बारे में किसी समाचार पत्र ,पत्रिका या समाचार पृष्ठ या दृश्य -श्रव्य माध्यम या संचार के किसी अन्य रूप में किसी रिपोर्ट में ऐसे नाम ,पते या विद्यालय या किसी अन्य विशिष्ट को प्रकट नहीं किया जाएगा , जिससे Children in Conflict with Law या देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक या किसी पीड़ित बालक या किसी अपराध के साक्षी की ,जो तत्समय प्रबृत किसी विधि के अधीन ऐसे मामले में अंतर्वलित है ,पहचान हो सकती है और न ही ऐसे किसी बालक का चित्र प्रकाशित किया जा सकता है |

परन्तु , यथास्तिथि ,जांच करने वाला किशोर न्याय बोर्ड ,ऐसा प्रकटन ,लेखबद्ध किये जाने वाले ऐसे कारणों से तब अनुज्ञात कर सकेगा,जब उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के सर्वोत्तम  हित में हो | 

16. अपनी पसंद के अधिवक्ता की सेवायें लेने का अधिकार-दंड प्रक्रिया सहिता, 1973 की धारा 301 के परन्तुक के अधीन रहते हुए बालक का कुटुंब या संरक्षक इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अपनी पसंद के अधिवक्ता की सेवाएं लेने के लिए हक़दार हैं | 

परन्तु,यदि बालक का कुटुंब या संरक्षक अधिवक्ता का खर्च वहन करने में असमर्थ है तो विधिक सेवा प्राधिकरण उसको अधिवक्ता उपलब्ध कराएगा |

बालक  को आयु निर्धारण का अधिकार-अधिकाँश आपराधिक घटनाओं में दृष्टिगोचर होता है कि पुलिस चालानी में पुलिस द्वारा अपने अनुमान के अनुसार Children in Conflict with Law की उम्र लिख देती है | जिसके कारण गिरफ्तारी के बाद किशोर को प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए बनी कारागार में भेज दिया जाता है |

17.आयु निर्धारण का अधिकार-Children in Conflict with Law को यह अधिकार है कि वह स्वयं को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष उपस्थित हो कर या पुलिस द्वारा बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करने पर अपनी आयु का निर्धारण करा सकता है | 

बोर्ड को बालक की सही आयु के सम्बन्ध में कोई शंका है तो वह बालक की  ओर से साक्ष्य प्राप्त करके आयु निर्धारण करता है |

किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम , 2015 की धारा 94(3) के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड द्वारा उसके समक्ष इस प्रकार लाये गए व्यक्ति की अभिलिखित आयु ,इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए उस व्यक्ति की सही आयु समझी जाती है |

18. पोक्सो अधिनियम,२०१२ के तहत विशेष न्यायलय के समक्ष बालक को आयु निर्धारण का अधिकार-लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम ,2012 की धरा 34(1) के अनुसार जहाँ अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी बालक द्वारा किया जाता है वहां ऐसे Children in Conflict with Law पर किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम, 2015 के उपबंधों के अधीन कार्यवाही की जाती है |

वही धरा 34(2) स्पष्ट करती करती है कि यदि विशेष नन्यायालय के समक्ष  किसी कार्यवाही में आयु के सम्बन्ध में कोई प्रश्न उठता है कि कोई  व्याक्ति बालक है या नहीं तो ऐसे प्रश्न का अवधारण विशेष न्यायलय द्वारा ऐसे व्याक्ति की आयु के सम्बन्ध में स्वयं का समाधान करने के पश्चात किया जाता है |

19. अपील और पुनरीक्षण का अधिकार-Children in Conflict with Law को विधि अनुसार अपील और पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है | इसके अतरिक्त उसे अधिनियम के प्रसाशन में अनुसरित किये जाने वाले साधारण सिद्धांतों में से एक नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अंतर्गत पुनर्विलोकन का अधिकार भी प्राप्त है | यह बालक का अत्यधिक अहम् अधिकार है जो कि किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम,2015 के अंतर्गत विधि का उलंघन करने वाले बालक को प्रदत्त किया गया है |

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निष्कर्ष

आज के बालक नए भारत का मुस्तकबिल  बनेंगे | सयुंक्त राष्ट्र आपराधिक न्याय वयवस्था में  बालकों (जिसमें Children in Conflict with Law भी शामिल हैं) को प्रौढ़ अपराधियों के रूप में  देखने को प्रतिषेदित करता है | 

इसी लिए सयुंक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने बालकों के मानव अधिकारों  के संवर्धन एवम संरक्षण के लिए  अपने यहाँ  विशेष  कानूनों का निर्माण किया है और अंतराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहते हुए उनका क्रियान्वयन कर रहे है |

नए भारत की संकल्पना को सिद्धि में बदलने के लिए , बालक, जो कि देश का मुस्तकबिल है ,को सम्पूर्ण समाज और आपराधिक न्याय वयवस्था के सभी अवयवों तक शामिल हैं, द्वारा सहेजने की आवश्यकता है | 

बालको की वकालत करने वाले  सभी लोग जिसमे अधिवक्ता से लेकर मनोवैज्ञानिक ,गैर सरकारी संघटन ,सामाजिक  और मानव अधिकार कार्यकर्ता तथा आपराधिक न्याय व्यवस्था के सभी अवयवों  द्वारा  बालको के मानव अधिकार सम्बन्धी सिद्धांतों को व्यवहार में उतार  कर ही देश के भविष्य को एक नई  दिशा प्रदान की जा सकती है | 

उक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की भी महती आवश्यकता है |  

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सन्दर्भ

1.यूनीवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स 1948

2. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम ,1987

3. बाल अधिकारों पर सयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन 1989

4. बच्चों के अधिकार पर कन्वेंशन 1992

5.मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम ,1993

6.लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम ,2012

7.किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रश्न 1. Children in Conflict with Law का तात्पर्य क्या है?

उत्तर : Children in Conflict with Law अर्थात विधि का उल्लंघन करने वाले बालक से आशय ऐसे बच्चों से है जिन्होंने 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो तथा उनके ऊपर किसी अपराध को करने का आरोप हो | Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 ऐसे बच्चों के साथ दंडात्मक के बजाय सुधारात्मक और पुनर्वास-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने पर अधिक बल देता है।

प्रश्न 2. JJ Act 2015 में Children in Conflict with Law के अधिकार क्या हैं?

उत्तर ; JJ Act 2015 के अंतर्गत Children in Conflict with Law को कई अधिकार प्रदान किये गए हैं जैसे कि गरिमा, गोपनीयता, निष्पक्ष प्रक्रिया, कानूनी सहायता, परिवार से संपर्क तथा पुनर्मिलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पुनर्वास सम्बंधित अधिकार प्राप्त हैं। इन अधिकारों की बुनियाद बाल अधिकार और मानवाधिकार के सिद्धांतों में समाहित है।

प्रश्न 3 . क्या Children in Conflict with Law को अपराधी माना जाता है?

उत्तर : नहीं। JJ Act 2015 का उद्देश्य बच्चे को कलंकित करने के बजाय उसकी परिस्थितियों को समझना, सुधार करना और समाज में स्थापित करना है |

प्रश्न 4 . JJ Act 2015 में बच्चे की उम्र कितनी होनी चाहिए?

उत्तर : JJ Act 2015 के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति बच्चा माना जाता है। बच्चे की आयु घटना के दिन निर्धारित की जाती है कि व्यक्ति कथित अपराध की तारीख पर बच्चा था या नहीं, यह महत्वपूर्ण होता है।

प्रश्न 5 . क्या Children in Conflict with Law को कानूनी सहायता का अधिकार है?

उत्तर :हाँ । Children in Conflict with Law को कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।

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अस्वीकरण :

यह Blog केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

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Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)

 लेखक

Dr Raj Kumar





























आज के समाज में ,बालकों के मानव अधिकारों का उलंघन एक ज्वलंत  सामाजिक और मानवाधिकार  मुद्दा है | जिस पर हमें संजीदगी और गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है | 

किशोरों द्वारा किये गए अपराधों के सन्ध में किशोरों के साथ प्रौढ़ अपराधियों  के जैसा व्यवहार अंतराष्ट्रीय कानूनों द्वारा प्रतिषिद्ध किया गया  है  म्ब

इस सन्दर्भ में भारत में पहला क़ानून 1986 में आया, जिसे वर्ष 2000 में संशोधित किया गया तथा उसके बाद किशोरों के बृहद हित को ध्यान रखते हुए एक बार फिर वर्ष 2015 में वर्ष 2000 वाले क़ानून को समाप्त कर नए क़ानून को लाया गया जो कि किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 कहलाया | इस अधिनियम के माध्यम से, बालकों के संरक्षण और मानव अधिकारों की रक्षा में समाज से लेकर आपराधिक न्याय वयवस्था तक  सभी स्तरों पर सहयोग की आवश्य्कता है |

उक्त अधिनियम का उद्देश्य है कि अधिनियम के अधीन भारतीय संविधान के अनुछेद 15 के खंड (3), अनुच्छेद 39 के खंड ( ) और खंड ( ),अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 47 के उपबंधों के अधीन यह सुनिश्चित करने के लिए कि बालकों की सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जाए और उनके मूलभूत मानव अधिकारों की  पूर्णतया संरक्षण किया जाए |,शक्तियां प्रदान की गई है, और कर्तव्य अधिरोपित किये हैं |

यह अधिनियम  स्पष्ट करता है कि तत्समय किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट  किसी बात के होते हुए हुए भी ,इस अधिनियम के उपबंध के तहत देख रेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों से सम्बन्धित सभी मामलों तथा विधि का उलंघन करने वाले बालकों से सम्बंधित सभी मामलों पर लागू होंगे जिसके अंतर्गत

(1) विधि का उलंघन करने बालकों की गिरफ्तारी,निरोध,अभियोजन शास्ति और,पुनर्वास और समाज में पुनः मिलाना |

() देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालकों के पुनर्वास ,दत्तक ग्रहण ,समाज में पुनः मिलाने और वापसी की प्रक्रियाएं और विनिश्चिय अथवा आदेश भी शामिल हैं |

इस अधिनियम में  बाल अपचारी, जिसे विधि का उल्लंघन करने वाला बालक के रूप में परिभाषित किया गया है ,को उनके मानव अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई मानक प्रावधान किये गए हैं

अधिनियम के अनुसार बालकों को दंड के प्रावधान  प्रौढ़ अपराधियों के मुकाबले अत्यधिक लचीले बनाये गए हैं | बालकों के अधिकार भी मानव अधिकार की श्रेणी में आते है

बाल अधिकारों पर कन्वेंशन 1989 मानता  है कि किशोरों के भी मानव अधिकार हैं , और  18 वर्ष से छोटी उम्र के व्यक्तियों को यह  सुनिश्चित करने के लिए विशेष  सुरक्षा की आवश्यकता है कि उनका पूर्ण विकास ,उनके अस्तित्व और उनके सर्वोत्तम हितों का सम्मान किया जाए |

यूनीवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स  1948 में बिना किसी विभेद के सभी को मानव होने के नाते मानव अधिकार प्राप्त हैं

लेकिन उक्त घोषणा पत्र में किशोरों के विशेष सन्दर्भ में कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं था | लेकिन समय के साथ साथ विधि का उलंघन करने वाले बालकों  और पीड़ित किशोरों  के मानव अधिकारों के संवर्धन अवं संरक्षण के लिए विशेष कानूनों की आवश्यकता महसूस की गयी जिसकी भरपाई के लिए  बच्चों के अधिकार पर कन्वेंशन 1992 को स्वीकृत और अंगीकृत किया गया |  

भारत सरकार ने सयुक्त राष्ट्र की साधारण  सभा द्वारा अंगीकृत बालकों के अधिकारों से सम्बंधित अभिसमय को,जिसमे ऐसे मानक विहित किये गए हैं  जिसका बालक के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करने के लिए  सभी राज्य पक्षकारों द्वारा पालन किया जाना है ,का दिनांक ११ दिसम्बर २०९२ को अंगीकरण किया गया |

यह लेख उन असहाय विधि का उलंघन करने वाले बालकों के मानव अधिकारों की अवधारणा को समझने और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए  सामजिक, विधिक और  मानव अधिकार सन्दर्भ में जागरूकता फैलाने का एक प्रयास है |

मानव अधिकार सामान्य तौर पर वे अधिकार है जो हर व्यक्ति को उसके मनुष्य होने नाते स्वतः प्राप्त होते है | ये अविभाज्य ,अन्तर्सम्बन्धित और अन्तर्निर्भर होते है

साधारण तौर पर मानव अधिकारों को आर्थिक,सामजिक,सांस्कृतिक,नागरिक और राजनैतिक मानव अधिकारों की श्रेणी में रखा गया है

इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत और सामूहिक मानव अधिकार की श्रेणी में विभक्त किया गया है | बालकों के मानव अधिकार सामूहिक मानव अधिकारों की श्रेणी में आते हैं | 

सयुंक्त राष्ट्र  की परिभाषा के अनुसार मानव अधिकार जाति ,लिंग ,राष्ट्रीयता ,भाषा ,धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव किये बिना सभी को प्राप्त हैं |

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम,१९९३ की धरा के  अनुसार "मानव अधिकार " का तात्पर्य  संविधान के अंतर्गत गारंटीकृत  अथवा अंतर्राष्ट्रिय प्रसंविदाओं में सम्मिलित तथा भारत के न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय जीवन,स्वंत्रता,समानता तथा व्यक्ति की गरिमा से सम्बंधित अधिकार है |

विधि का उल्लंघन करने वाले बालकों द्वारा किये गए अपराधों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है :

प्रथम  श्रेणी में "छोटे अपराधजिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय  प्रबृत अन्य विधि के अधीन अधिकतम दंड  3 मॉस के कारावास का है |

द्वितीय श्रेणी में "घोर अपराधजिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय  प्रबृत  अन्य विधि के अधीन -

()तीन वर्ष से अधिक और 7 वर्ष से अनधिक की अवधि के न्यूनतम कारावास का उपबंध है |

() वर्ष से अधिक के अधिकतम कारावास का उपबंध है किन्तु कोई न्यूनतम कारावास या वर्ष से कम के न्यूनतम कारावास का उपबंध नहीं है |

तृतीय श्रेणी में "जघन्य अपराध" रखे गएँ हैं |जिसके लिए भारतीय दंड सहिता  या तत्समय प्रबृत  अन्य विधि के अधीन न्यूनतम कारावास 7 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का है |

 किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)अधिनियम, 2015 में विधि का उलंघन करने वाले बालकों के मानव अधिकारों को प्रत्यछ रूप में उद्द्घृत नहीं किया गया है लेकिन उसके कई प्रावधान अप्रत्यछ रूप में  विधि का उलंघन करने वाले बालकों के मानव अधिकारों की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं तथा उनके मानव अधिकारों का संवर्धन एवम संरक्षण को  बढ़ावा देते हैं |

बालकों के ये मानव अधिकार किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)अधिनियम, 2015 के प्रसाशन में अनुसरित किये जाने वाले साधारण सिद्धांतों के रूप में इंगित किये गए हैं | ये मूलभूत सिद्धांत केंद्रीय सरकारोंबोर्ड ,समिति या अन्य अभिकरण द्वारा अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वयन करते समय मार्गदर्शन के रूप में कार्य करते है

ये मूलभूत सिद्धांत ही दरअसल विधि का उलंघन करने वाले बालकों के मानव अधिकार है | ये बालक के मानव अधिकारों का संवर्धन और संरक्षण करते हैं

ये मूलभूत सिद्धांत निम्न प्रकार हैं :

निर्दोषिता की उपधारणा का अधिकार- किसी विधि का उलंघन करने वाले बालक के १८ वर्ष की आयु पूर्ण करने तक यह उपधारणा की जाएगी कि वह किसी असद्भावना पूर्वक या आपराधिक आशय का दोषी नहीं है |

गरिमा और योग्यता का अधिकार- सरकार ,किशोर न्याय बोर्डबाल कल्याण समिति या अन्य अभिकरण के द्वारा सभी बालकों के साथ गरिमा और अधिकारों के साथ वर्ताब किया जाना चाहिए

विधिक कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार- प्रत्येक विधि का उलंघन करने वाले बालक को सुने जाने का और उसके हितों को प्रभावित करने वाली सभी कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है |

बालक के सर्वोत्तम  हित का सिद्धांत- बालक के सम्बन्ध में सभी विनिश्चय /आदेश मुख्यतया इस आधार पर किये जाएंगे कि वे बालक के सर्वोत्तम हित में हों | बालक के इस मानव अधिकार का का दारोमदार बालकों के सम्बन्ध में क़ानून का क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं पर है जिसमे सरकार,किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति  तथा अन्य अभिकरण आते हैं |

सुरक्षा का सिद्धांत-विधि का उलंघन करने वाले बालक की सुरक्षा के हित में सभी उपाय किये जाने चाहिए| जो बालक को  उपहानी ,दुर्व्यवहार या बुरे  बर्ताव से बचाते हों |

गैर कलंकीय शब्दार्थों का सिद्धांत- विधि का उलंघन करने वाले किसी बालक के सम्बन्ध में किये गए आदेश या विनिश्चय में प्रतिकूल या अभियोगात्मक शब्दों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए |  

अधिकारों का अधित्यजन किये जाने का सिद्धांत- विधि के अनुसार विधि का उलंघन करने वाले बालक के किसी अधिकार का किसी भी प्रकार से अधित्यजन (त्याग) अनुज्ञेय या विधिमान्य नहीं है | चाहे उस अधिकार को त्यागने की इच्छा उस बालक द्वारा या बालक की और से कार्य करने वाले व्यक्ति  या किसी बोर्ड या समित द्वारा  क्यों की गयी हो | किसी मूल अधिकार का प्रयोग किया जाना अधित्यजन की कोटि में नहीं आता है |

समानता और विभेद किये जाने का सिद्धांत- विधि का उलंघन करने वाले किसी बालक के विरुद्ध किसी भी आधार पर ,जिसमे लिंग ,जाति ,नस्ल ,जन्म स्थान ,निसक्तता भी आती है ,किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा  और पहुंच ,अवसर  और बर्ताव में समानता हर बालक को दी जानी चाहिए |

एकान्तता और गोपनीयता के अधिकार का सिद्धांत- विधि का उलंघन करने वाले प्रत्येक बालक को सभी साधनो द्वारा और सम्पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया और व्यवस्था में अपनी एकान्तता और गोपनीयता का संरक्षण करने का अधिकार प्राप्त है |

अंतिम उपाय के रूप में बालकों को संरक्षण गृह में रखने का सिद्धांत-विधि का उलंघन करने वाले किसी बालक को उसकी युक्तियुक्त जांच के बाद ही अंतिम अवलम्बन के उपाय के रूप में संथागत देखरेख में रखा जाना चाहिए |

नए सिरे से शुरूआत करने का सिद्धांत- किशोर न्याय पद्धति के अधीन किसी बालक के अपराध से सम्बंधित पिछले सभी अभिलेखों को विशेष परिस्थितियों के सिवाय समाप्त कर दिया जाना चाहिए अन्यथा की स्थिती में नहीं |

बालक और प्रौढ़ अभियुक्त की कार्यवाही का एक साथ होने का सिद्धांत- किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 की धारा 23(1) के अनुसार दंड प्रक्रिया सहिंता ,1973 की धरा 223 में या तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी विधि का उलंघन करने वाले  किसी  बालक के साथ किसी ऐसे व्याक्ति  की जो बालक नहीं है, सयुंक्त कार्यवाही नहीं की जा सकती है

विधि का उलंघन करने वाले बालकों के विरुद्ध पारित किया जा सकने वाला आदेश- किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,2015 की धारा 21 के तहत विधि का उलंघन करने वाले  किसी बालक को इस अधिनियम  के  उपबंधों अधीन या भातीय दंड संहिता 1860 या तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन ऐसे किसी अपराध के लिए छोड़े  जाने की संभावना के बिना मृत्यु या आजीवन कारावास का दंडादेश नहीं दिया जाएगा |

किसी अपराध के निष्कर्षों के आधार पर निर्हर्ताओ से मुक्ति का अधिकार- किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५ की धारा २४() के अनुसार तत्समय प्रबृत किसी अन्य विधि में किसी अन्य बात के होते हुए भी ,कोई बालक ,जिसने कोई अपराध किया है तथा जिसके बारे में इस अधिनियम के अधीन कार्यवाही  की जा चुकी है | किसी ऐसी निर्हता (अयोग्यता )से ,यदि कोई हो ,ग्रस्त नहीं माना जाएगा ,जो ऐसी विधि के अधीन किसी अपराध की दोषसिद्धि से जुडी हो ;

 इसी अधिनियम की धरा २४() के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड ,पुलिस को या बालक न्यायालय या अपनी स्वयं की रजिस्ट्री को यह निदेश देते हुए आदेश देगा कि ऐसी दोषसिद्धि के सुसंगत अभिलेख ,यथास्तिथि ,अपील की अवधि या ऐसी युक्तियुक्त अवधि,जो विहित की जाए ,समाप्त होने के पश्चात नष्ट कर दिए जायेगे | परुन्त जघन्य अपराध की दिशा में यह स्तिथि लागू नहीं होगी |

निजता का अधिकार- किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५ की धारा ७४() के  अंतर्गत बालक की  पहचान के प्रकटन का प्रतिषेद किया गया है जिसके अनुसार किसी जांच या अन्वेषण या  न्यायिक प्रक्रिया के बारे में किसी समाचार पत्र ,पत्रिका या समाचार पृष्ठ या दृश्य -श्रव्य माध्यम या संचार के किसी अन्य रूप में किसी रिपोर्ट में ऐसे नाम ,पते या विद्यालय या किसी अन्य विशिष्ट को प्रकट नहीं किया जाएगा , जिससे विधि का उलंघन करने वाला बालक या देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक या किसी पीड़ित बालक या किसी अपराध के साक्षी की ,जो तत्समय प्रबृत किसी विधि के अधीन ऐसे मामले में अंतर्वलित है ,पहचान हो सकती है और ही ऐसे किसी बालक का चित्र प्रकाशित किया जा सकता है |

परन्तु , यथास्तिथि ,जांच करने वाला किशोर न्याय बोर्ड ,ऐसा प्रकटन ,लेखबद्ध किये जाने वाले ऐसे कारणों से तब अनुज्ञात कर सकेगा,जब उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के सर्वोत्तम  हित में हो

अपनी पसंद के अधिवक्ता की सेवायें लेने का अधिकार- दंड प्रक्रिया सहिता, १९७३ की धारा ३०१ के परन्तुक के अधीन रहते हुए बालक का कुटुंब या संरक्षक इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अपनी पसंद के अधिवक्ता की सेवाएं लेने के लिए हक़दार हैं

परन्तु,यदि बालक का कुटुंब या संरक्षक अधिवक्ता का खर्च वहन करने में असमर्थ है तो विधिक सेवा प्राधिकरण उसको अधिवक्ता उपलब्ध कराएगा |

 बालक  को आयु निर्धारण का अधिकार- अधिकाँश आपराधिक घटनाओं में दृष्टिगोचर होता है कि पुलिस चालानी में पुलिस द्वारा अपने अनुमान के अनुसार विधि का उलंघन करने वाले बालक की उम्र लिख देती है | जिसके कारण गिरफ्तारी के बाद किशोर को प्रौढ़ व्यक्तियों के लिए बनी कारागार में भेज दिया जाता है | विधि का उलंघन करने वाले बालक को यह अधिकार है कि वह स्वयं को किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष उपस्थित हो कर या पुलिस द्वारा बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करने पर अपनी आयु का निर्धारण करा सकता है | बोर्ड को बालक की सही आयु के सम्बन्ध में कोई शंका है तो वह बालक की  ओर से साक्ष्य प्राप्त करके आयु निर्धारण करता है |

किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५ की धारा ९४(३)के अनुसार किशोर न्याय बोर्ड द्वारा उसके समक्ष इस प्रकार लाये गए व्यक्ति की अभिलिखित आयु ,इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए उस व्यक्ति की सही आयु समझी जाती है |

पोक्सो अधिनियम,२०१२ के तहत विशेष न्यायलय के समक्ष बालक को आयु निर्धारण का अधिकार- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम ,२०१२ की धरा ३४ (१)के अनुसार जहाँ अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी बालक द्वारा किया जाता है वहां ऐसे बालक पर किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५  के उपबंधों के अधीन कार्यवाही की जाती है |

वही धरा ३४(२) स्पष्ट करती करती है कि यदि विशेष नन्यायालय के समक्ष  किसी कार्यवाही में आयु के सम्बन्ध में कोई प्रश्न उठता है कि कोई  व्याक्ति बालक है या नहीं तो ऐसे प्रश्न का अवधारण विशेष न्यायलय द्वारा ऐसे व्याक्ति की आयु के सम्बन्ध में स्वयं का समाधान करने के पश्चात किया जाता है |

अपील और पुनरीक्षण का अधिकार- विधि का उलंघन करने वाले बालक को विधि अनुसार अपील और पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है | इसके अतरिक्त उसे अधिनियम के प्रसाशन में अनुसरित किये जाने वाले साधारण सिद्धांतों में से एक नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अंतर्गत पुनर्विलोकन का अधिकार भी प्राप्त है | यह बालक का अत्यधिक अहम् अधिकार है जो कि किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५  के अंतर्गत विधि का उलंघन करने वाले बालक को प्रदत्त  किया गया है |

 आज के बालक नए भारत का मुस्तकबिल  बनेंगे | सयुंक्त राष्ट्र आपराधिक न्याय वयवस्था में  बालकों को प्रौढ़ अपराधियों के रूप में  देखने को प्रतिषेदित करता है | इसी लिए सयुंक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने बालकों के मानव अधिकारों  के संवर्धन एवम संरक्षण के लिए  अपने यहाँ  विशेष  कानूनों का निर्माण किया है और अंतराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहते हुए उनका क्रियान्वयन कर रहे है |

नए भारत की संकल्पना को सिद्धि में बदलने के लिए , बालक, जो कि देश का मुस्तकबिल है ,को सम्पूर्ण समाज और आपराधिक न्याय वयवस्था के सभी अवयवों तक शामिल हैं, द्वारा सहेजने की आवश्यकता है | बालको की वकालत करने वाले  सभी लोग जिसमे अधिवक्ता से लेकर मनोवैज्ञानिक ,गैर सरकारी संघटन ,सामाजिक  और मानव अधिकार कार्यकर्ता तथा आपराधिक न्याय वयवस्था के सभी अवयवों  द्वारा  बालको के मानव अधिकार सम्बन्धी सिद्धांतों को व्यवहार में उतार  कर ही देश के भविष्य को एक नई  दिशा प्रदान की जा सकती है | उक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की भी महती आवश्यकता है 

 सन्दर्भ

.यूनीवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स १९४८ 

. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम ,१९८७ 

बाल अधिकारों पर सयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन १९८९

बच्चों के अधिकार पर कन्वेंशन १९९२

.मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम ,१९९३

 ६.लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम ,२०१२

 ७.किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षक)अधिनियम ,२०१५



 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                                                                                  

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