UGC 2026 Regulations: उच्च शिक्षा सुधार का नया युग क्यों?

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Source:ChatGPT प्रस्तावना  UGC 2026 Regulations भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी के अनुरूप मानव अधिकार ढाँचे में ढ़ालने का प्रयास हैं। ये नियम अकादमिक गुणवत्ता, प्रशासनिक पारदर्शिता और शिक्षा तक समान पहुँच जैसे मानव अधिकार सिद्धांतों को सीधे संबोधित करते हैं। UGC 2026 Regulations अचानक किसी फाइल में जन्मा सुधार नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुँची रोहित बेमुला और पायल तड़वी की माँओं की पीड़ा से उपजा उच्च शिक्षा में किसी भी प्रकार के भेदभाव के निषेध का एक सजीव दस्तावेज है |  इसी समस्या के समाधान के लिए भारतीय उच्च शिक्षा में समानता का नया युग स्थापित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थाओं में समता का संवर्धन )नियम, 2026 को  13 जनवरी 2026 से लागू किया गया था |  यह लेख मानव अधिकार सन्दर्भ में एक तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है |  यह भी पढ़ें  : मानव अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा अभियान 2026: भारत की चुनौतियाँ   UGC क्या है और नियम किस अधिनियम के तहत बनाये गए हैं ?  विश्व विद्यालय ...

भारत में ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को डॉक्टर (Dr.) का दर्जा — एक मानवाधिकार संदर्भ

अप्रैल 2025 में NCAHP Commission ने एक दिशा-निर्देश जारी किया है जिसमें कहा गया कि Physiotherapists को “Dr” उपनाम के साथ “PT” लिखने की अनुमति है। ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट्स भी इस सम्मान के अधिकारी हैं |
Source:Chat GPT

प्रस्तावना

भारत में स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ डॉक्टर्स पर निर्भर नहीं करती हैं बल्कि वह एक व्यापक प्रणाली का अभिन्न अंग है | इस प्रणाली में डॉक्टर के अलावा नर्सों, फिजियोथेरेपिस्टों, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्टों और अन्य पैरा-मेडिकल पेशेवरों की संयुक्त भूमिका रहती है | 

लेकिन हाल के दिनों में “डॉ (Dr.) उपनाम के उपयोग” को लेकर मुद्दा काफी गर्माया हुया है | इस सम्बन्ध में फिजियोथेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट लम्बे समय से सरकार से मांग करते आये हैं | जिसे समय- समय पर विभिन्न कारणों से टाला जाता रहा है | कई बार यह मुद्दा कोर्ट में जा चुका है |

राष्ट्रीय संबंद्ध अवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग (NCAHP) की ओर से फिजियोथेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे "डॉ." और पीछे क्रमशः "PT" तथा "OT" का उपयोग करने की अनुमति दी है | जो उनकी पेशेवर पहचान और सामाजिक गरिमा के लिए आवश्यक है | 

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ऑक्यूपेशनल थेरेपी(OT) क्या है? 

अनेक व्यक्ति विभिन्न कारणों से शारीरिक, मानसिक या सामाजिक अक्षमताओं से जूझते हैं | ऐसी स्थति में इन व्यक्तियों को पुनः सामान्य जीवन जीने में मदद की अत्यधिक आवश्यकता होती है | 

इस आवश्यकता की पूर्ती के लिए खास किस्म के विशेषज्ञों और कुशल व्यक्तियों की आवश्यकता होती है | जिसकी पूर्ती सिर्फ और सिर्फ ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy) का पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर सकते हैं | 

अतः ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy) का मुख्य उद्देश्य शारीरिक, मानसिक या सामाजिक अक्षमताओं से ग्रस्त व्यक्तियों को पुनः सामान्य जीवन जीने में मदद  करना होता है |

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय शारीरिक दिव्यांग्जन संस्थान (PDUNIPPD), दिल्ली 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय शारीरिक दिव्यांग्जन संस्थान (PDUNIPPD) सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान है | इस शैक्षणिक संस्थान की गिनती राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में होती है |  इस संस्थान का व्यावसायिक चिकित्सा विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है | यह संस्थान व्यावसायिक चिकित्सा स्नातक के छात्रों को शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करता है।
Source:Self Click picture 

यह सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान है | इस शैक्षणिक संस्थान की गिनती राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में होती है |  इस संस्थान का व्यावसायिक चिकित्सा विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है |यह संस्थान व्यावसायिक चिकित्सा स्नातक के छात्रों को शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करता है। 

यह विभाग न्यूरोमस्कुलर और मस्कुलोस्केलेटल विकारों से पीड़ित व्यक्तियों का उपचार और पुनर्वास भी करता है।इस विधा के तहत रीढ़ की हड्डी,तंत्रिका सम्बंधित चोटों,बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार, मंद बुद्धि सम्बंधित समस्याएं, दर्दनाक चोटों और मस्तिष्क पक्षाघात जैसी अनेक शारीरिक और मानसिक समस्यों का मूल्यांकन, आंकलन और उपचार किया जाता है | 

यह उपचार विभिन्न चिकित्स्कीय गतिविधयों और उपकरणों का उपयोग करते हुए किया जाता है | यह रोगी की कार्यात्मक क्षमताओं में सुधार और पूर्व की भांति बहाली के लिए किया जाता है | 

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ऑक्यूपेशनल थेरेपी:स्वास्थ्य प्रणाली का उपेक्षित स्तंभ क्यों?

ऑक्यूपेशनल थेरेपी के साढ़े चार वर्षीय पाठ्यक्रम द्वारा छात्रों को न सिर्फ रिहैबिलिटेशन (Rehabilitation) के विशेषज्ञ के तौर पर तैयार किया जाता है बल्कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य, दिव्यांगता सहायता से लेकर बृद्धावस्था देख्भाल में विशेषज्ञ के तौर पर भी तैयार किया जाता है | 

माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी का पंडित दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्रीय शारीरिक दिव्यांग्जन संस्थान (PDUNIPPD), दिल्ली के ऑक्यूपेशनल थेरेपी विभाग में दौरा
Source:Website of PDUNIPPD

इन क्षेत्रों में ऑक्यूपेशनल थेरेपी तथा ऑक्यूपेशनल थिरेपिस्ट की अत्यधिक महत्व पूर्ण भूमिका होती है | लेकिन दुर्भाग्यवश भारत में ऑक्यूपेशनल थिरेपिस्ट (OT) को अक्सर सहायक की भूमिका तक सीमित रखा जाता है —जबकि उनके पास स्नातक से लेकर डॉक्टरेट तक की शिक्षा और क्लिनिकल अनुभव और विशेषज्ञता होती है। 

यह स्थति व्यवहारिक रूप से अत्यधिक दयनीय और विभेद्यकारी है | यह भेदभाव चिकित्सा प्रणाली के समान क्षेत्र में विभिन्न विषयों के आधार पर ऑक्यूपेशनल थिरेपिस्ट का मुख्या धारा से निष्कासन को बढ़ावा देता है | 

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में अपना रूतबा बनाये रखने की भेदभाव पूर्ण सोच के चलते राष्ट्रीय संबंद्ध अवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग (NCAHP) की ओर से फिजियोथेरेपिस्ट तथा ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे "डॉ." और पीछे क्रमशः "PT" का उपयोग करने की अनुमति दिये जाने के बावजूद अनावश्यक अवरोध पैदा कर रहे हैं | 

जहाँ तक विषय की बात है तो चिकित्सा विज्ञान में भी समय के साथ साथ अनेक नए विषयों का इजाफा हुआ है जिनका बड़ी इज्जत और सम्मान के साथ  समावेश किया जाता रहा है | 

जबकि मात्र दो विषयों ऑक्यूपेशनल थेरेपी तथा फिजियोथेरपी के समावेश पर अनावश्यक आपत्तियों का कोई मतलब नहीं है | 

यह दर्जा उन्हें विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए संसद द्वारा बनाये गए क़ानून के तहत दिया जा रहा है | हाँ यह अवश्य हो सकता है कि दो कानूनों के बीच कुछ टकराव हो | उसका भी समाधान निकाला जाता है | 

अब समय आ गया है कि उक्त मुद्दे को स्वंत्रता, गरिमा और समानता के लेंस से देखा जाय | यह सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं है बल्कि अब यह मानव अधिकार का मुद्दा है | 

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ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को कैसे मिला डॉक्टर (Dr.) का दर्जा 

भारतीय संसद द्वारा नेशनल कमीशन फॉर अलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस (NCAHP )एक्ट ,2021 पास किया गया | 

इस विधेयक पर हुई बहस के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा था  कि विधेयक का उद्देश्य इस क्षेत्र की लंबे समय से लंबित मांगों को पूरा करना और पेशेवरों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाना है |  

उन्होंने यह भी कहा कि , "पैरामेडिक्स और संबद्ध स्वास्थ्यकर्मी चिकित्सा पेशे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका योगदान डॉक्टरों के बराबर, या उससे भी ज़्यादा है। 

सरकार के अनुसार, इस कानून से लगभग 9 लाख संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग (NCAHP) एक  राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसायों आयोग विधेयक, 2021 के तहत गठित एक वैधानिक नियामक निकाय है। 

इस विधेयक ने उन संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की शिक्षा और अभ्यास को विनियमित और मानकीकृत करने का प्रयास किया है | जो पहले से मौजूद नियामक निकायों, जैसे कि भारतीय चिकित्सा परिषद, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, इंडियन नर्सिंग काउंसिल, आदि के दायरे में नहीं आते थे। 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसायों (एनसीएएचपी) द्वारा अप्रैल 2025 में फिजियोथेरेपी 2025 के लिए योग्यता-आधारित  एक नया पाठ्यक्रम प्रकाशित किया गया | 

इस पाठ्यक्रम में एक प्रावधान किया गया जिसके तहत फिजिओथेरपिस्टों को उपसर्ग के रूप में "Dr" और प्रत्यय के रूप में "PT"/"OT" के उपयोग की अनुमति दी गई है | 

यह विधेयक उन संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को पेशेवर पहचान, सम्मान, बराबरी और गरिमा प्रदान करने के लिए है, जिनके योगदान की चिकित्सा के क्षेत्र में अथक परिश्रम और सेवा के बावजूद  अनदेखी की गई है |  

हमेशा से डॉक्टर्स के सहायक की स्थति में काम करने वाले फिजियोथेरेपिस्ट तथा ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के लिए यह बदलाव किसी फरिस्ते से कम नहीं है | यह दर्जा उन्हें आसानी से नहीं मिला है | यह समुदाय इसकी मांग लम्बे समय से कर रहा था | 

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ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को मिले डॉक्टर (Dr.) के दर्जे पर आपत्ति क्यों ?

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग(एनसीएएचपी) की ओर से फिजिओथेरपिस्टों को उपसर्ग के रूप में "Dr" और प्रत्यय के रूप में "PT"/"OT" के उपयोग की अनुमति के बाद इस मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया है | 

फिजियोथेरेपी 2025 के लिए योग्यता-आधारित नया पाठ्यक्रम के (पृष्ठ 29, बिंदु संख्या 3.2.3) पर फिजियोथेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे "डॉ." और पीछे "PT"/"OT" का उपयोग करने की अनुमति प्रदान की गई है |
Source:Website of National Commission for Allied and Healthcare Profession

फिजियोथेरेपी 2025 के लिए योग्यता-आधारित नया पाठ्यक्रम के (पृष्ठ 29, बिंदु संख्या 3.2.3) पर फिजियोथेरेपिस्ट को अपने नाम के आगे "डॉ." और पीछे "PT"/"OT" का उपयोग करने की अनुमति प्रदान की गई है | 

जिसके बाद आपत्ति करते हुए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (Director General of Health Services (DGHS) ने एक दिशानिर्देश जारी किया है| 

जिसमें कहा गया है कि फिजियोथेरेपिस्ट (Physiotherapist) को अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ शब्द (Word ‘Doctor’) लिखने का अधिकार नहीं है |ऑक्यूपेशनल थेरेपी तथा फिजियोथेरेपी दोनों पाठ्यक्रम एक ही पायदान पर आते हैं | 

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नए सरकारी आदेश की वैधानिक स्थिति

फिजियोथेरेपिस्ट अपने नाम के आगे "डॉक्टर" लगा सकते हैं या नहीं, इस मुद्दे पर 9 सितम्बर को लिखे एक पत्र में डीजीएचएस डॉ. सुनीता शर्मा ने कहा कि नाम के आगे "Dr " उपसर्ग का उपयोग करने वाले फिजियोथेरेपिस्ट भारतीय चिकित्सा डिग्री अधिनियम 1916 का कानूनी उलंघन करेंगे | 

लेकिन एक दिन बाद ही 10 सितम्बर, 2025 अपना रुख बदल लिया और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को लिखा अपना पत्र वापस ले लिया, जिसमें उसने फिजियोथेरेपिस्टों को "डॉक्टर" न लगाने के अपने रुख से सहमति जताते हुए कहा था कि इस पर और विचार-विमर्श की ज़रूरत है।

इसके सीधे मायने हैं कि फिजियोथेरेपिस्ट या ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट भले ही उच्च  शिक्षा प्राप्त हों तथा क्लिनिकल विशेषज्ञ हों , तब भी  वह  “Dr.” उपनाम का प्रयोग नहीं कर सकतेहैं | 

लेकिन इसके विपरीत नेशनल कमीशन फॉर अलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस (NCAHP )एक्ट ,2021 में प्रावधान किया गया है कि अलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स को शिक्षा, प्रशिक्षण और पंजीकरण के माध्यम से "स्वायत्त पेशेवर" का दर्जा दिया जाए | 

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मुद्दे का मानव अधिकार सन्दर्भ 

यह मुद्दा मानवाधिकार सन्दर्भ में सिर्फ " Dr" के रूप में उपनाम का नहीं है बल्कि पेशेवर पहचान और मानवीय गरिमा का भी है |  

जैसे कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने विधेयक पर बहस के दौरान कहा था कि विधेयक का उद्देश्य पैरामेडिक्स और संबद्ध स्वास्थ्यकर्मीयों की भूमिकाओं को गरिमा प्रदान करना है|  

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पेशेवर पहचान और समानता का अधिकार

भारतीय संविधान के अनुछेद 21 के तहत हर व्यक्ति को समानता और गरिमा के साथ कोई भी मनपसंद पेशा चुनने का अधिकार है | 

यदि ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को उनकी शिक्षा, योग्यता और प्रशिक्षण के बावजूद नाम के आगे "Dr " शब्द लगाने से वंचित किया जाता है तो यह यह सामान अवसर और गरिमा के अधिकार को गंभीर चुनौती है |  

आगे का रास्ता 

1. स्पष्ट दिशा निर्देश 

स्वास्थय मंत्रालय को राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसायों आयोग विधेयक, 2021 के उद्देश्यों को दृष्टिगत  रखते हुए तथा संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों के हितों को ध्यान में रखते हुए उक्त मुद्दे पर स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने चाहिए | 

इस सम्बन्ध में आपत्तियों को भी सुने जाने में कोई बुराई नहीं है | क्यों कि संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों की समस्या का समाधान नए अधिनियम के तहत ही किया जाना है | 

2. कानूनी संशोधन से समाधान 

समस्या के समाधान के लिए तथा विधिगत अस्पष्टता से बचने के लिए सरकार राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा व्यवसायों आयोग विधेयक, 2021 तथा भारतीय चिकित्सा डिग्री अधिनियम 1916 में आवश्यक स्पष्टीकरण या संशोधन का रास्ता अपना सकती है | 

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निष्कर्ष 

भारत में ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को "Dr " उपनाम देना या न देना केवल तकनीकी मुद्दे के दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका दायरा बहुत व्यापक है | 

यह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट की पेशेवर गरिमा, सामान अवसर और मानव अधिकारों से जुड़ा हुया गंभीर प्रश्न है | जिसके लिए ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट लम्बे समय से कानून के दायरे में मांग कर रहे हैं | 

जिसे भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग(एनसीएएचपी) की ओर से जारी एक आदेश के द्वारा करीब -करीब स्वीकार कर लिया गया है |  

सरकार को नीति निर्धारण के समय पेशेवरों की शिक्षा, उनका प्रशिक्षण और समाज में उनके महत्वपूर्ण योगदान और महत्व को ध्यान में रखना चाहिए | 

"Dr " उपनाम से बड़ा मुद्दा है -ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के सम्मान, पहचान, बराबरी और उनके मानवाधिकारों का |  

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ):

प्रश्न 1 : ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को डॉक्टर का दर्जा क्यों दिया जा रहा है?

उत्तर : भारत सरकार ने Allied Health Professionals, जो पहले से मौजूद नियामक निकायों, जैसे कि भारतीय चिकित्सा परिषद, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, इंडियन नर्सिंग काउंसिल, आदि के दायरे में नहीं आते हैं, के पेशे को सम्मान और समान दर्जा देने के लिए यह कदम उठाया है। जिससे ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को डॉक्टर जैसी पेशेवर पहचान और सामाजिक गरिमा मिल सके | 

प्रश्न 2 : इस निर्णय से मानवाधिकारों का क्या संबंध है?

उत्तर : यह ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट और फिजियोथेरेपिस्ट की पेशेवर गरिमा, समानता और पेशे की पहचान और सम्मान से जुड़ा मानवाधिकार मुद्दा है।

प्रश्न 3 : क्या ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट डॉक्टर कहलाएंगे ?

उत्तर : हाँ, वे डॉक्टर (Dr)  उपाधि का उपयोग अपने Allied Health Profession के संदर्भ में कर सकेंगे लेकिन मेडिकल प्रैक्टिशनर लाइसेंस के रूप में नहीं कर सकेंगे | 

प्रश्न 4 : इस आदेश से कौन-कौन लाभान्वित होंगे?

उत्तर : भारत के सभी पंजीकृत ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, फ़िज़ियोथेरेपिस्ट आदि  — जो National Commission for Allied and Healthcare Professions (NCAHP) Act, 2021 के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं — उन सभी को लाभ मिलेगा।

प्रश्न 5 : क्या यह फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी है?

उत्तर : हाँ, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय संबद्ध एवं स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग(एनसीएएचपी) की ओर से 2025 में जारी नवीनतम दिशानिर्देशों के अनुसार, यह दर्जा वैध और आधिकारिक माना जाएगा।

प्रश्न 6 : यह फैसला किस भारतीय कानून /अधिनियम के अधीन किया गया है ? 

उत्तर : यह फैसला, नेशनल कमीशन फॉर अलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस एक्ट(NCAHP Act), 2021 -जो Allied Health Professionls की शिक्षा के मानक, पंजीकरण, मान्यता और उनके अधिकारों को अधिनियमित करता है, के तहत विधि अनुकूल किया गया है |  

प्रश्न 7 : इस फैसले का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव क्या होगा?

उत्तर : इस फैसले का भारतीय ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को वैश्विक स्तर पर अधिक सम्मान और अवसर मिलेंगे। क्यों कि इस विधा के विशेषज्ञों की  बहुत माँग है तथा भारत का यह कदम विश्व स्वास्थ्य संगठन अवं अंतराष्ट्रीय स्वास्थ्य पेशे के मानकों के अनुसरण में है | 

प्रश्न 8 : मानवाधिकार की दृष्टि से यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर : क्योंकि यह फैसला ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को स्वायत पेशे में व्यक्ति के सम्मानजनक पहचान के अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है तथा स्वास्थ्य सेवाओं में समान अवसरों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है | 

प्रश्न 9 : डॉ सुनीता शर्मा स्वास्थ्य सेवाओं की कौन हैं?

उत्तर : डॉ. सुनीता शर्मा, एक प्रोफेसर तथा स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस)  हैं | 

अस्वीकरण :

यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

 लेखक

Dr Raj Kumar
Founder, HumanRightsGuru / LawVsReality


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टिप्पणियाँ

  1. सराहनीय लेख 👏👏

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  2. ज्ञान से भरपूर और सराहनीय लेख

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  3. आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।साथ बने रहिए।

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  4. Well written n very informative article

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