बाल अधिकारों की बड़ी जीत : सुप्रीम कोर्ट ने 44 साल बाद ह्त्या के दोषी को दी आजादी
परिचय
बाल न्याय से सम्बंधित एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा | जिसमे न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की खंडपीठ द्वारा फैसला सुनाया गया | फैसले से स्पष्ट होता है कि बच्चे हमेशा बच्चे होते हैं| आपराधिक न्याय प्रक्रिया में बच्चों की ओर विशेष ध्यान दिया गया है |
अदालत ने अभी हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को रिहा करने के आदेश दिए, जो ह्त्या का अपराध करते समय कानूनन नाबालिग था |कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया था|
44 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिहाई के आदेश दे दिए | भारत में न्यायालय सिर्फ दोषियों को को सजा देने के लिए नहीं बने हैं, बल्कि बालकों के मानव अधिकारों की रक्षा का भी उत्तरदायित्व उनके ऊपर है |
सुप्रीम कोर्ट ने इसी उत्तरदायित्व के निर्वहन में इस मामले के बालअपचारी की रिहाई का रास्ता प्रशस्त किया |
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मुकदद्मे की पृष्ठभूमि
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| Image by Mohamed Hassan from Pixabay |
यह मामला हंस राज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मुकदद्मे से सम्बंधित है | उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में वर्ष 1981 में एक ह्त्या की घटना घटी |
जिसके उपरान्त एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई थी | घटना के समय आरोपी की उम्र 12 वर्ष 5 माह थी | पुलिस द्वारा उसे गिरफ्तार कर लिया गया |
मुकदद्मे के विचारण के परिणाम स्वरुप 1984 में आरोपित को दोषी करार दिया गया | उसके बाद वर्ष 2000 मे इलाहबाद हाई कोर्ट ने उसे राहत दी |
इसके बाद राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई | वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और इसके बाद वर्ष 2022 में अभियुक्त की गिरफ्तारी दुबारा से कर ली गई और वह तब से जेल में था |
वर्ष 2000 में संशोधित किशोर न्याय (बालको की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम लाया गया | जिसमे बच्चो के अधिकारों के संरक्षण के विशेष प्रावधान किये गए हैं |
इसी अधिनियम के तहत अभियुक्त ने अपनी आयु के प्रश्न को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी | उसने बताया कि वह घटना के समय क़ानून के अनुसार नाबालिग था | इसलिए उसे उक्त अधिनियम के तहत राहत प्रदान की जाए |
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला : आजीवन कारावास पर प्रतिबन्ध
आजीवन कारावास की सजा के सम्बन्ध में नाबालिगों को किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम ,2000 के तहत संरक्षण प्राप्त है |
किसी भी व्यक्ति के नियमानुसार नाबालिग घोषित हो जाने के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा नहीं सुनाई जा सकती है |
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| Image by Myriams-Fotos from Pixabay |
यह संरक्षण उसे उक्त क़ानून के द्वारा प्राप्त है | अदालत का मानना है कि यह अधिनियम बच्चों को दण्डित करने के लिए नहीं बना है, बल्कि बच्चों का पुनर्वास करने के उद्देश्य से बना है |
अदालत का यह भी मानना है कि किसी नाबालिग को 3 वर्ष से अधिक समय तक संरक्षण गृह में रखना क़ानून के विरुद्ध है |
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000 की धारा 15 (1) (G) तथा संशोधित अधिनियम, 2015 की धारा 18 (1 )(G ) के तहत किसी किशोर को 3 वर्ष से अधिक समय तक सुधार गृह में नहीं रखा जा सकता है |
इस मुकदद्मे में बालअपचारी 3 वर्ष से अधिक की अवधि जेल में गुजार चुका है | इस लिए किशोर द्वारा 3 वर्ष से ऊपर की जेल में बिताई गई अवधि को संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है |
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
1. जे जे एक्ट ,2000 लागू होने से पहले के मामलो पर भी लागू
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2000 के लागू होने से पहले के मामले पर भी यह एक्ट लागू होगा | अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक्ट सामाजिक रूप से लाभकारी क़ानून है |
इस लिए इसे पस्चगामी रूप से भी लागू किया जा सकता है | इसका अर्थ है कि यदि कोई अपराध इस एक्ट के लागू होने से पहले किया गया हो लेकिन घटना के समय वह व्यक्ति नाबालिग रहा हो, ऐसी स्थति में भी उसे इस क़ानून के संरक्षण का लाभ मिलेगा |
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2. नाबालिग घोषित कराने की माँग का अधिकार
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कोई व्यक्ति जिसने किसी आपराधिक घटना को अंजाम दिया है और यह पता लगता है कि घटना के दिन उसकी उम्र 18 वर्ष से कम रही है |
ऐसी स्थति में वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से घटना के बाद किसी भी स्तर पर चाहे विचारण, अपील, रिवीजन या आदेश और निर्णय हो जाने के बाद तक स्वयं के नाबालिग होने का दावा प्रस्तुत कर सकता है |
इस सम्बन्ध में न्यायालय क़ानून के अनुसार किशोर अपचारी घोषित करने की प्रक्रिया का पालन करते हुए उसके नाबालिग होने की लिखित में घोषणा करता है |
विधि व्यवस्था प्रताप सिंह बनाम झारखंड राज्य, 2005 में स्थापित किया गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा किशोर होने का दावा कार्यवाही के किसी भी चरण में किया जा सकता है, यहाँ तक कि आपराधिक मुकददमे की समाप्ति के बाद भी।
इसके अतिरिक्त एक अन्य विधि दृष्टांत धर्मबीर बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ) (2010) में स्थापित किया गया है कि बालक होना एक प्रक्रियात्मक बचाव के बजाय एक मूलभूत अधिकार है—अपराध के दशकों बाद भी इसका दावा किया जा सकता है।
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3. अवधि से अधिक कैद मानव अधिकारों का हनन
सुप्रीम कोर्ट ने स्थापित किया है कि जब कोई व्यक्ति क़ानून द्वारा निर्धारित अवधि से अधिक समय तक बंद रहता है तो यह संविधान का उलंघन होता है |
4. डिजिटल न्याय का नया अध्याय
इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की रिहाई के आदेश पर तत्काल कार्यवाही की जावे | इसके लिए प्रामाणिक प्रतिलिपि का इन्तजार किये बिना डिजिटल आदेश को ही स्वीकारते हुए उसकी रिहाई सुनिश्चित की जावे |
डिजिटल कॉपी से रिहाई का आदेश देना दर्शाता है कि बच्चों के मामले में न्याय पालिका डिजिटल टेक्नोलॉजी का उपयोग कर समय से न्याय सुनुश्चित करना चाहती है |
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किशोर न्याय अधिनियम के उद्देश्य
जे जे एक्ट, 2000 और इसका संशोधित संस्करण, 2015 के उद्देश्यों से स्पष्ट है कि हर बच्चे को सुधार का अवसर मिलना चाहिए | इसके कुछ उद्देश्य निम्नवत हैं :
1.अपराधी बच्चों को सुधार और पुनर्वास का मौक़ा देना
2.उन्हें वयस्क अपराधियों की संगत से अलग रखना
3.उन्हें समाज में पुनः समायोजित करना तथा उनके अधिकारों का संरक्षण करना
4.न्यायिक प्रक्रिया में बच्चों की उम्र, मानसिक स्थति और पारिवारिक स्थति को ध्यान रखते हुए फैसले करना
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट होता है कि वह बच्चों के मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है |
उसने यह भी बता दिया है कि सामाजिक अधिनियम का सही क्रियान्वयन किस प्रकार करना चाहिए | एक बार बालक घोषित उस मुकदद्मे के लिए वह व्यक्ति हमेशा बालक ही रहता है |
वह बालक होने के नाते जे जे एक्ट जैसे सोशल लेजिस्लेशन के सभी लाभों को पाने का अधिकारी होता है | जे जे एक्ट के तहत बने नियमों में प्रावधानित किया गया है कि न्यायालय द्वारा घोषित किशोर यदि, उसे एक्ट में दिए गए अधिकार, त्यागना भी चाहे तो त्याग नहीं सकता है |
उ० प्र ० किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) नियम, 2019 में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि किसी भी बालक को इस अधिनियम और उसके अधीन बनाये गए नियमों के फायदों से वंचित नहीं किया जाएगा | बाल उपचारियों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है |
यही नहीं उसके अधिकारों को त्यागने के लिए उसे कोई बाध्य भी नहीं कर सकता है |
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मानवाधिकार सन्दर्भ में फैसला मत्वपूर्ण क्यों ?
इस फैसले ने भारत के मानवाधिकार क्षेत्र में नया अध्याय जोड़ दिया है | यह दिखाता है कि
1. जीवन के अधिकार पर समय हावी नहीं हो सकता है |
2. अपराध न्याय व्यवस्था में सजा के स्थान पर सुधार का एक विशेष महत्व है |
3.बच्चे बेशक अपराधी हों लेकिन उन्हें आपराधिक आशय से नहीं देखा जाना चाहिए |
बच्चों के सम्बन्ध में, 18 वर्ष की आयु तक यह अवधारणा की जाएगी कि वह किसी असदभावनापूर्वक या आपराधिक आशय का दोषी नहीं है |
यह निर्दोषिता की उपधारणा का सिद्धांत कहलाता है जो संशोधित अधिनियम की धारा 3(I) में प्रावधानित है |
4.बालअपचारीयों के सम्बन्ध में सर्वोत्तम हित का सिद्धांत लागू होता है | इसका प्रावधान संशोधित अधिनियम की धारा 3 (IV) में किया गया है |
इसमें स्थापित किया गया है कि सभी विनिश्चय मुख्य्तया इस विचारण पर आधारित होंगे कि वे बालक के सर्वोत्तम हित में हैं और बालक के लिए अपनी पूर्ण सक्तता को विकसित करने में सहायक हैं |
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि (UNCRC) के उन प्रावधानों के अनुसरण में हैं जो कहते हैं कि हर बच्चे का सम्मान, सुरक्षा और पुनर्वास उसका मानव अधिकार है|
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निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक बालअपचारी की रिहाई नहीं है, बल्कि भारत में बाल अधिकारों की बड़ी जीत का घोतक है |
इस मुकदद्मे के बाल अपचारी को 44 वर्ष बाद मिली रिहाई से पुरानी कहावत चरितार्थ होती है कि न्याय में देर संभव है अंधेर नहीं |
यह ऐतिहासिक फैसला आने वाले समय में किशोर न्याय प्रणाली को और अधिक सशक्त बनाएगा और बच्चों के प्रति समाज की संवेदनशीलता को बढ़ाने का कार्य करेगा |
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अस्वीकरण :
यह लेख केवल शैक्षणिक और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |
Note: Image credit: AI-generated illustration (created with ChatGPT)
लेखक
Dr Raj Kumar
Founder- HumanRightsGuru / LawVsReality




