स्वास्थ्य मानवाधिकारों की बड़ी जीत : "ORS" केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

 प्रस्तावना 

भारत में जीवन का अधिकार सिर्फ जानवरो की तरह जीवन जीने या सास लेने के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि सवास्थ्य जीवन जीने का मौलिक अधिकार भी है | 

हाल ही में "ORS " विवाद में एक जागरूक डॉक्टर, न्यायपालिका और न्यामक संस्थाओं की सक्रीय भागेदारी ने यह सिद्ध कर दिया कि भ्रामक विज्ञापन और झूठे दावे जनता के साथ गंभीर खिलवाड़ है और भारतीय कानून और न्याय व्यवस्था इसे बर्दास्त नहीं करेंगे | 

स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन अंग है | किसी को भी भारत में आम लोगों के स्वास्थ्य के अधिकार से खिलवाड़ करने की आजादी नहीं दी जा सकती है | 

स्वास्थ्य अधिकार एक महत्व पूर्ण मानव अधिकार है | विभिन फोरम से दिए गए फैसलों ने स्वास्थ्य अधिकारों के दायरों को विस्तृत आयाम दिया | 

इस लेख में इस केस की पृष्टभूमि, महत्व पूर्ण निर्णय, मानव अधिकार और भविष्य की चुनौतियों को जानने का  प्रयास करेंगे| 

पृष्ठ्भूमि : विवाद की शुरुआत , "ORS" तथा WHO 

1. ORS  क्या है ?

आदेश के बाद केवल WHO मानक का अनुपालन करने वाली कम्पनियों को अपने उत्पाद पर "ORS" लिखने की अनुमति अन्यथा नहीं |
Source:Social Media

"ORS" का तात्पर्य है Oral Rehydration Salts /Solutions -यह दस्त या अन्य किसी कारणों से शरीर में पानी व इलेक्ट्रोलाइट की कमी  को दूर करने के लिए एक प्रामाणिक चिकित्सा मिश्रण होता है |   

"ORS" की प्रामाणिक संरचना का निर्धारण WHO (विश्व स्वास्थय संगठन ) द्वारा किया गया है | जिसमे सोडियम ,पोटेसियम ,क्लोराइड ,ग्लूकोस आदि की संतुलित मात्रा होती है | 

जबकि बाजार में कुछ पेय /पेय पदार्थ निर्माता "ORS," शब्द का उपयोग कर रहे थे, लेकिन उस उत्पाद में WHO के मानक का पालन नहीं कर रहे थे | जो कि स्वास्थ्य के लिए लाभ की जगह हानिकारक होते हैं | 

अर्थात WHO के मानकों का उलंघन करके "ORS " शब्द का उपयोग कर निम्न मानक के उत्पाद बना रहे थे | उनके उत्पादों में शर्करा की मात्रा मानकों से ज्यादा थी | जो दस्त के समय नकारात्मक प्रभाव भी भी डाल सकती है | 

दस्त सम्बन्धी बीमारियों में होने वाली पानी की कमी को रोकने में "ORS" के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए  विश्व भर में  विश्व ORS दिवस हर वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाता है |  

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2. डॉ शिवरंजनी के अथक प्रयास 

डॉ शिवरंजनी संतोष के अथक प्रयासों से अब कोई भी कंपनी WHO मानक के विपरीत कोई भी उत्पाद "ORS" के लेबल के साथ नहीं बेच सकेगी | इसके लिए उन्होंने 8  वर्ष तक संघर्ष किया |
Source: Instragram of Dr Shivranjani

हैदराबाद की एक साहसी महिला डॉ शिवरंजनी संतोष ने "ORS" की हो रही गलत मार्केटिग के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया | इस दौरान उन्होंने मामले को विभिन्न गैर न्यायक और न्यायिक संस्थानों के सामने उठाया | 

डॉ ने इस मुद्दे को मीडिया, उपभोक्ता फोरम और अंत में न्यायालयों में उठाया | उनका कहना है कि शर्करा युक्त पेय पदार्थों को "ORS" कहना भ्रामक और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है | 

महिला डॉक्टर को इस सम्बन्ध में लड़ाई लड़ते -लड़ते 8 वर्ष गुजर गए | अंत में डॉक्टर साहब, सामाजिक कार्यकर्ता तथा लेखक  की जीत हुई है | इस जीत से समाज को अत्यधिक लाभ होने को हैं | 

स्वास्थ्य के मानव अधिकार क्षेत्र की उन्होंने अकेले के दम पर न सिर्फ बहुत बड़ी लड़ाई लड़ी है, बल्कि जीत भी हासिल की है | 

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3. FSSAI  और सुप्रीम कोर्ट का दखल 

पहली बार FSSAI ने "ORS" नाम के गलत उपयोग को लेकर नोटिस जारी किया और कंपनियों को आदेश दिया कि वे उत्पाद पर लिखें  - "यह WHO मानक ORS नहीं है |" 

वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णायक निर्देश में स्पष्ट किया गया कि " कोई भी उत्पाद, यदि वह  WHO मानक के अनुरूप नहीं है, तो उसमे ORS शब्द का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा |"  

बिना WHO मानक का उपयोग किये किसी उत्पाद पर "ORS" लेबल लगाना अब खाध सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत अपराध माना जाएगा | 

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4. उपभोक्ता सुरक्षा की गारंटी 

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुरूप दिया गया है | जो झूठे और भ्रामक विज्ञापन को अपराध मानता है | 

आजकल दवाओं के क्षेत्र में भ्रामक विज्ञापनों की बाढ़ सी आई हुई है | यह उपभोक्ता अधिकारों के साथ- साथ जीवन के अधिकार के लिए भी एक गंभीर ख़तरा है | 

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मानव अधिकार दृष्टिकोण 

दस्त की बीमारी में रोगी के शरीर में पानी की कमी हो जाती है | कभी -कभी यह कमी जानलेवा हो जाती है | ऐसी स्तिथि में व्यक्ति की जान बचाने के लिए शरीर में तरल पदार्थ की कमी को दूर करने की जरूरत होती है | 

इसकी कमी को दूर करने के लिए "ORS" की आवश्यकता होती है | दस्त से पीड़ित व्यक्ति की जान बचाने का यह एक सामान्य और प्रामाणिक उपचार है | 

इस उपचार को विश्व स्वास्थ्य संघटन (WHO) द्वारा मान्यता प्राप्त है | इसकी वजह से विश्व भर में लाखों लोगों की जान को बचाया जा सका है और दस्त के कारण मृत्यु दर में कमी दर्ज की गयी है | 

हर व्यक्ति की WHO के मानक अनुसार बने "ORS" उत्पादक तक पहुंच स्वास्थ्य के अधिकार की अधीन आती है | यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक स्वास्थय का मसला है |  

स्वास्थ्य के अधिकार को न सिर्फ भारतीय संविधान ने मान्यता दी है बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकार घोषणाओं और संधियों में भी स्पष्ट प्रावधान किये गए है |

सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्था विंसेंट पणिकुरलंगारा बनाम भारत संघ(1987)  में न्यायालय ने स्थापित किया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का रखरखाव और सुधार राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।राज्य का यह कर्तव्य अनुच्छेद 47 से लिया गया  है तथा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है।

आर्थिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा की धारा 12 मे  भी  स्वास्थ्य का अधिकार को प्रमुखता से तवज्जो दी गई है | भारत इन घोषणाओं और सन्धियों का एक सदस्य देश है | इस लिए ये प्रावधान भारत में भी लागू होते है | 

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निष्कर्ष 

आम आदमी के लिए असली "ORS" उत्त्पाद की उपलब्ध्ता के लिए अनवरत 8 वर्ष तक एक महिला डॉ  शिवरंजनी संतोष ने संघर्ष किया | 

इस संघर्ष के बाद मिली सफलता ने स्पष्ट कर दिया है कि समाज के कल्याण का कोई भी मुद्दा न्यायपालिका और नियामक संस्थाओं के समक्ष सही ढंग और ईमानदारी से रखा जाए तो विजय अवश्यम्भावी होती है | 

फैसले के बाद रूआँसू मुद्रा में डॉ शिवरंजन संतोष | जिन्होंने WHO के मानक के अनुरूप "ORS" के उत्पादन और बिक्री के लिए  8 वर्ष संघर्ष संघर्ष किया |
Source: Instragram of Dr Shivranjani

डॉ संतोष ने देश के तमाम आम नागरिकों के लिए स्वास्थ्य के अधिकार, जो कि जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है, के संवर्धन और संरक्षण के लिए अथक संघर्ष किया है | 

वे फैसला आने के बाद इतनी भावुक हुई कि रुआसु हो गई | उनके अथक प्रयासों से अब कोई भी कंपनी WHO मानक के विपरीत कोई भी उत्पाद "ORS" के लेबल के साथ नहीं बेच सकेगी |

जिससे उपभोक्ताओं को असली उत्पाद मिल सकेगा | इसके अतिरिक्त इस फैसले का असर फार्मा उद्योग, हेल्थ नुट्रिशन, हेल्थ ड्रिंक्स पर भी पडेगा और भविष्य में उपभोक्ताओं के स्वास्थय के मानव अधिकार की रक्षा हो सकेगी | 

डॉ शिवरंजनी संतोष का यह संघर्ष भारत में भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों और उपभोक्ता सुरक्षा दोनों के लिए मील का पत्थर साबित होगा | 

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ )

प्रश्न 1: ORS  क्या है ?

उत्तर: ORS एक Oral Rehydration Salts है | इसका उपयोग दस्त या अन्य किसी कारणों से शरीर में पानी व इलेक्ट्रोलाइट की कमी  को दूर करने के लिए  किया जाता है | इसमें सोडियम, पोटेसियम, क्लोराइड, ग्लूकोस आदि की WHO के मानक अनुरूप संतुलित मात्रा होती है |

प्रश्न 2 : ओआरएस (ORS) का महत्व क्या है?

उत्तर : ओआरएस(ORS) का उपयोग दस्त के कारण होने वाली पानी की कमी के इलाज के रूप में किया जाता है | 

प्रश्न 3 :  विश्व ओआरएस (ORS) दिवस क्यों मनाया जाता है?

उत्तर : विश्व ओआरएस (ORS) दिवस हर साल 29 जुलाई को मनाया जाता है | यह दस्त सम्बन्धी बीमारियों में होने वाली पानी की कमी को रोकने में ORS के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है |  

प्रश्न 2: क्या "ORS" शब्द अब किसी गैर मानक पेय पर लिखा जा सकता है ? 

उत्तर : नहीं ,यदि कोई पेय उत्पाद WHO के मानक के अनुरूप नहीं है तो उस उत्पाद के ऊपर "ORS" शब्द को कानूनन नहीं लिखा जा सकता है | 

प्रश्न 3 : इस केस का उपभोक्ता अधिकारों  क्या प्रभाव पडेगा ? 

उत्तर : अब  उपभोक्ताओं को WHO के मानक के मानक के अनुरूप असली "ORS " उत्पाद मिल सकेगा | क्यों कि कम्पनियाँ "ORS " का भ्रामक लेबल नहीं  सकेगी | 

प्रश्न 4 : क्या "ORS" मामला अन्य क्षेत्रों  असर डालेगा ? 

उत्तर : हाँ , इसका असर फार्मा उद्योग, न्यूट्रिशन, हेल्थ ड्रिंक्स और चिकित्सा उत्पादों पर पडेगा और उच्च गुणवत्ता और मानक के उत्पाद उपभोक्ताओं को मिल सकेंगे |   

प्रश्न : क्या हर व्यक्ति की WHO के मानक अनुसार बने "ORS" उत्पादक तक पहुंच स्वास्थ्य के अधिकार के अधीन आती है | 

उत्तर : हाँ ,असली और मानक के अनुसार बने "ORS" उत्पाद तक हर व्यक्ति की पहुंच स्वास्थ्य के अधिकार के अधीन आती है | 

अस्वीकरण :

यह लेख केवल शैक्षणिक और विधिक जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है | यह किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या मामले के लिए कानूनी सलाह नहीं है | अधिक जानकारी के लिये योग्य अधिवक्ता से परामर्श आवश्यक है |

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 लेखक

Dr Raj Kumar

Founder- Human Rights Guru / Law Vs Reality     

 
 



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