Top 5 Human Rights Articles प्रत्येक भारतीय नागरिक को पढ़ने चाहिए (2026 गाइड)
![]() |
| Source:by Waldryano from Pixabay image |
भारत का न्यायिक इतिहास आश्चर्यजनक फैसलों से भरा पड़ा है | यह सर्व विदित है कि स्थानीय न्यायालय क़ानून से बंधे होते हैं लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट साम्या के कोर्ट होते हैं |
इन्हे असाधारण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं | इनके फैसले विधि व्यवस्था को नई दिशा देते हैं तथा मानवीय पहलुओं को भी समझने का अवसर देते हैं |
28 अक्टूबर 2025 को K .Kirubkaran vs State of Tamilnadu, 2025 INSC 1272 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला भी एक ऐसा ही फैसला है, जिसमे पोक्सो के तहत दोषी ठहराए गए आरोपित युवक को दोषमुक्त कर दिया गया |
यह मामला सिर्फ दोष मुक्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह क़ानून की सख्ती और करुणा के बीच संतुलन का बेहतरीन उदाहरण है |
इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ पोक्सो में आरोपित को राहत दी, बल्कि अपराध की पीड़िता को भी न्याय दिया गया है | यह फैसला कानूनी तौर पर संब्रद्ध है तथा भावुक करने वाला है |
पोक्सो को एक शक्त कानून के रूप में बनाया गया है | इस कानून का उद्देश्य बच्चों को किसी भी तरह के यौन अपराधों अर्थात यौन शोषण या यौन उत्पीड़न से बचाना है |
इस कानून के तहत नाबालिगों के यौन शोषण या उत्पीड़न की स्तिथि में उसकी उम्र 18 वर्ष से कम होने पर सहमति के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जाता है |
अर्थात नाबालिग के साथ किसी भी तरह का यौन शोषण या उत्पीड़न चाहे वह मित्रता या प्रेम के कारण हो, पोक्सो कानून के अधीन अपराध की श्रेणी में आता है | अदालत का यह फैसला पोक्सो कानून से ऊपर उठकर हैं |
आरोपित को पोक्सो कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1872 की धारा 366 और यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 6 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था | उसे क्रमशः 5 वर्ष और 10 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई।
इस दोषसिद्धि और सजा से व्यथित होकर, अपीलकर्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय में अपील दायर की। इसे 13 सितंबर, 2021 के आक्षेपित निर्णय और आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया। जिसके बाद उसने माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया |
इस प्रकरण में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब पीड़िता (जो माननीय सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के समय विधिक रूप से आरोपित की पत्नी बन चुकी थी) ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया और कहा :
वह आरोपित /अपीलकर्ता पर निर्भर है | आरोपित और पीड़िता के विवाह से पैदा हुए बच्चे के साथ एक सुखी, सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहती है।
उच्च न्यायालय में अपील के लंबित रहने के दौरान, अपीलकर्ता और अपराध पीड़िता के बीच मई 2021 में विवाह संपन्न हुआ।
इसके बाद कोर्ट के समक्ष सिर्फ कानून का प्रश्न नहीं था, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के रूप में एक परिवार के टूटने और एक बच्चे के भविष्य का प्रश्न भी था।
![]() |
| Source:by contato1034 from Pixabay |
6 फरवरी 2024 के एक आदेश द्वारा सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को आरोपित /अपीलकर्ता की पत्नी की कुशलक्षेम जानने का निर्देश दिया था।
इसके अनुसरण में, तमिलनाडु विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव ने अपीलकर्ता की पत्नी से बातचीत की और एक रिपोर्ट प्रस्तुत की |
इस रिपोर्ट में बताया गया कि विवाह के बाद अपीलकर्ता और उसकी पत्नी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई है, जो एक वर्ष से भी कम आयु का है, और यह भी कि वे एक सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
भारत में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए वर्ष 2012 में पोक्सो क़ानून लाया गया था | यह क़ानून 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षरण दिलाता है तथा इसकी गिनती कठोर कानूनों में सुमार होती है |
![]() |
| Source:by NoName_13 from Pixabay |
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो के एक मामले में फैसला सुनाया है | इस फैसले के दोनों पात्रों अर्थात प्रेमी और प्रेमिका हैं |
दोनों के बीच पारस्परिक सहमति से सम्बन्ध बने | लेकिन इस मामले में घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी अर्थात पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी |
सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरोपित को हुई सजा को निरस्त कर दिया गया | जिसमे अदालत ने आरोपी की मंशा को आधार बनाया है | अदालत ने वासना और प्रेम में अंतर को स्पष्ट किया है | इस मामले में अदालत ने आरोपी की मंशा को वासना नहीं माना है बल्कि उसे प्रेम करार दिया है |
एनफोल्ड इंडिया द्वारा किए गए एक अध्ययन जिसका शीर्षक "POCSO अधिनियम के तहत रोमांटिक मामले - असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में विशेष न्यायालयों के निर्णयों का विश्लेषण" है, ने 1,715 ऐसे मामलों का विश्लेषण किया।
![]() |
| Source:by ahernandez07 from Pixabay |
जून 2022 में जारी निष्कर्षों के अनुसार, 80.2 प्रतिशत मामलों में, लड़की के माता-पिता या रिश्तेदार सूचनाकर्ता थे।
1,508 मामलों (87.9 प्रतिशत) में, लड़की ने आरोपी के साथ रोमांटिक रिश्ते में होने की बात स्वीकार की।
लड़की का यह कबूलनामा या तो सबूत के चरण के दौरान या सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पुलिस को अपना बयान देते समय या सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट को अपना बयान देते समय हुआ।
यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि 81.5 प्रतिशत मामलों में, लड़की ने गवाही के दौरान आरोपी के खिलाफ कुछ भी दोषपूर्ण नहीं कहा।
विधि व्यवस्था अजय कुमार बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) 2022 SCC OnLine Del 3705 और मद्रास उच्च न्यायालय ने विजयलक्ष्मी बनाम राज्य ,2021 SCC OnLine Mad 317 में POCSO अधिनियम के उद्देश्यों और कारणों के कथन की व्याख्या इस प्रकार की है कि, "इसका उद्देश्य किशोरों के बीच सहमति से बने प्रेम संबंधों को अपराध घोषित करना नहीं है।"
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधायिका द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार, अपीलकर्ता को एक जघन्य अपराध का दोषी पाए जाने के बाद, वर्तमान मामले में अपीलकर्ता और उसकी पत्नी के बीच हुए समझौते के आधार पर की गई कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।
लेकिन आगे न्यायालय ने केस की विशेष परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए कहा, हमारी राय में, अपीलकर्ता की पत्नी की करुणा और सहानुभूति की गुहार को नज़रअंदाज़ करना न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं करेगा।
यहाँ तक कि कानून के सबसे गंभीर अपराधियों को भी, उचित मामलों में ही सही, अदालतों से करुणा द्वारा नियंत्रित न्याय मिलता है। यहाँ विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, व्यावहारिकता और सहानुभूति को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस केस से जुड़े वास्तविक और व्यवहारिक तथ्यों को संज्ञान में लिया और आगे कहा कि "अपीलकर्ता और पीड़िता न केवल कानूनी रूप से विवाहित हैं, बल्कि पारिवारिक रूप से भी विवाहित हैं।"
पॉक्सो अधिनियम के तहत दंडनीय अपीलकर्ता द्वारा किए गए अपराध पर विचार करते हुए, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि "अपराध वासना का नहीं, बल्कि प्रेम का परिणाम था।"
अपराध की पीड़िता ने स्वयं अपीलकर्ता के साथ, जिस पर वह निर्भर है, एक शांतिपूर्ण और स्थिर पारिवारिक जीवन जीने की इच्छा व्यक्त की है बिना अपीलकर्ता के माथे पर अपराधी होने का अमिट कलंक लगाए।
आपराधिक कार्यवाही जारी रहने और अपीलकर्ता की कारावास में रहने से केवल इस पारिवारिक इकाई में व्यवधान उत्पन्न होगा और पीड़िता, शिशु बच्चे और समाज के ताने-बाने को अपूरणीय क्षति होगी।
इस प्रकार, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम यह मानने के लिए सहमत हैं कि यह एक ऐसा मामला है "जहाँ कानून को न्याय के लिए झुकना ही होगा।"
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” करने की असाधारण शक्ति प्राप्त है। इस केस में इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय अदालत और हाई कोर्ट से आरोपित की दोषसिद्धि को रद्द किया गया | आरोपी को रिहा किया किया गया |
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपीलकर्ता के विरुद्ध दोषसिद्धि और सजा सहित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना उचित समझते हैं। तदनुसार आदेश दिया जाता है।
विधि व्यवस्था शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन, (2023) 14 SCC 231 में सुप्रीम कोर्ट ने उक्त अनुच्छेद के अंतर्गत शक्ति की रूपरेखा को रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक "कारण या मामले" द्वारा अपेक्षित "पूर्ण न्याय" सामान्य या विशिष्ट सार्वजनिक नीति के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन किए बिना प्राप्त किया जाता है, तब तक अनुच्छेद 142(1) के अंतर्गत शक्ति और विवेक का प्रयोग वैध है |
माननीय अदालत द्वारा केस की पीड़िता अर्थात सुनवाई के समय आरोपित की पत्नी और उसके बच्चे की देखभाल की भी शर्त रखी गई |
साथ ही माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आरोपित को राहत देते हुए चेताया कि, अपीलकर्ता की पत्नी और बच्चे के हितों को ध्यान में रखते हुए, हम अपीलकर्ता को अपनी पत्नी और बच्चे को न छोड़ने और शेष जीवन में उनका सम्मानपूर्वक भरण-पोषण करने की विशिष्ट शर्त के अधीन करना उचित समझते हैं।
यदि भविष्य में अपीलकर्ता की ओर से कोई चूक होती है और उसकी पत्नी या बच्चे या शिकायतकर्ता द्वारा इस न्यायालय के संज्ञान में लाया जाता है, तो परिणाम अपीलकर्ता के लिए बहुत सुखद नहीं हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित निर्णय अक्सर स्थानीय न्यायालय या माननीय हाई कोर्ट द्वारा नजीर के रूप में उपयोग में लाये जाते हैं | लेकिन यह निर्णय एक अपवाद है |
माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस केस के अंत में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की गई है जिसमे कहा गया है कि , “यह केस केवल इन खास परिस्थितियों पर आधारित है, इसे नजीर की तरह अन्य मामलों में लागू नहीं किया जा सकता है |"
वर्तमान कानूनी व्यवस्था की कठोरताएँ उन किशोरों को भी अपराध के दायरे में लाकर खड़ा कर रही है जिसमे 16 से 18 वर्ष की उम्र के किशोर आपसी सहमति से रोमांटिक रिश्ते में चले जाते हैं | इस सम्बन्ध में एनफोल्ड इंडिया का शोध कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है |
आज भी अनेक देशों में सहमति की उम्र 16 वर्ष निर्धारित है | भारत में भी पिछले कई दशकों से सहमति की उम्र 16 वर्ष रही है | लेकिन वर्ष 2012 में POCSO Act लागू होने के साथ ही सहमति की उम्र 18 वर्ष कर दी गई |
POCSO एक्ट के पीड़ित व्यक्ति जिसमे महिला या पुरुष कोई भी हो सकता है | इस एक्ट को पीड़ित के सन्दर्भ में जेंडर न्यूट्रल रखा गया है |
विधि व्यवस्था सक्सेना बनाम भारत संघ, 2018 के मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सर्वोच्च न्यायालय से सहमति की वैधानिक आयु 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने का आग्रह किया है। उन्होंने यह भी कहा कि किशोरों के बीच यौन संबंधों को अपराध घोषित करना मनमाना, असंवैधानिक और बच्चों के सर्वोत्तम हितों के विरुद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आजकल न सिर्फ कानूनी जगत में चर्चा का विषय बना, बल्कि समाज में भी यह फैसला चर्चा का विषय बना हुया है |
इस फैसले से यह भी उजागर हुया है कि कानून का कार्य सिर्फ कठोर निर्णय करना नहीं होना चाहिए बल्कि कानून का अंतिम उद्देश्य समाज का कल्याण होना चाहिए |
यह फैसला संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व एसोसिएट जस्टिस बेंजामिन एन. कार्डोज़ो के कथन "कानून का अंतिम उद्देश्य समाज का कल्याण है" का पूर्ण रूप से समर्थन करता है।
इस निर्णय के बाबजूद भी किशोरों को सचेत रहने की जरूरत है क्यों कि इस निर्णय को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नजीर के रुतबे से वंचित कर दिया है |
प्रश्न 1 : सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में स्थानीय अदालत और हाई कोर्ट का फैसला क्यों बदला?
उत्तर :सुप्रीम कोर्ट को पीड़िता के हलफनामे से पता चला कि आरोपी और पीड़िता अब बालिग हो चुके हैं, उन्होंने अपील के दौरान शादी कर ली हैं और उनके एक बच्चा भी हो गया है | चूँकि अपराध प्रेम संबंध के कारण हुआ, और पीड़िता खुद अपने पति के साथ रहना चाहती है, इसलिए कोर्ट ने करुणा और वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए निर्णय दिया।
प्रश्न 2 : क्या पॉक्सो एक्ट में आरोपी को आसानी से दोषमुक्त किया जा सकता है?
उत्तर : नहीं। पॉक्सो कानून आरोपितों के लिए बहुत सख्त है और सामान्यतः ऐसे मामलों में रियायत नहीं मिलती। लेकिन इस केस में मामले की विशेष परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत यह निर्णय लिया है।
प्रश्न 3 :क्या यह फैसला भविष्य के मामलों में इस्तेमाल किया जा सकता है?
उत्तर : नहीं। कोर्ट ने साफ तौर पर इस फैसले को नजीर की श्रेणी से बाहर कर दिया है | इसे किसी भी अन्य मामले में नजीर के तौर पर उपयोग में नहीं लाया जा सकता है |
प्रश्न 4 : अनुच्छेद 142 का इस मामले में क्या महत्व है?
उत्तर : अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” करने का असाधारण अधिकार देता है। इसी अधिकार का उपयोग कर कोर्ट ने कानून की सख़्ती के बावजूद मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है।
प्रश्न 5 : कानून और करुणा में संतुलन कैसे संभव है?
उत्तर : माननीय सुप्रीम कोर्ट साम्या का कोर्ट है | इसलिए उसे संविधान के अनुछेद 142 के तहत "पूर्ण न्याय" सुनिश्चित करने के लिए असाधारण शक्तियां प्राप्त हैं | इस मामले में कोर्ट ने कानून का सम्मान करते हुए, करुणा के साथ वास्तविक जीवन की स्थितियों को समझकर "पूर्ण न्याय" के सिद्धांत को अपनाकर क़ानून और करुणा में संतुलन स्थापित किया है |
विशेष : दोस्तों लेख अच्छा लगा हो तो कमेंट, शेयर और फॉलो करना न भूलें | बने रहिये हमारे साथ |
Latest Human Rights Analysis trusted by global legal, academic & policy readers
काबिले-तारीफ, ज्ञानवर्धक व समसामयिक लेख
जवाब देंहटाएंआपकी तारीफों के पुल बांधती टिप्पणी के लिए हृदय की गहराइयों से धन्यवाद।आप जुड़े रहिए हमारे साथ और बढ़ाते रहिए हमारा हौसला ।आभार ।
जवाब देंहटाएं